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YUKTI PRAMAN

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युक्ति प्रमाण

“युक्तिश्च योजना , या तु युज्यते “। ( चरक )

किसी योजना को युक्ति कहते हैं , जिसके द्वारा युक्ति की जाती है ।
जाने हुए अर्थ के कारण की साम्यता , देखकर अज्ञात अर्थ में समाधानपूर्वक निश्चय कराने वाली बुद्धि को युक्ति कहा जाता है या योजना पूर्वक किए गए ज्ञान को युक्ति कहते हैं ।

युक्ति प्रमाण का स्वरूप

यद्यपि यह महर्षि चरक का चौथा प्रमाण है , फिर भी ( महर्षि चरक ने ही इसे विमानस्थान के चौथे अध्याय में
‘ अनुमानं खलु तर्को युक्त्यपेक्षः ‘ यह कहकर इसे अनुमान का ही आधार मानते हुए अनुमान का ही एक अंग बना दिया है , जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि यह अनुमान के ही अन्तर्गत है ।

वैशेषिक एवं बौद्ध आदि दर्शनों ने भी युक्ति को कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं माना है ।
चरक संहिता में प्रमाणों की गणना में युक्ति को भी स्थान दिया है । यद्यपि रोग परीक्षा हेतु विविध प्रमाणों ( प्रत्यक्ष , अनुमान , आप्त ) का ही उल्लेख किया है तथापि विषयों की सत्यासत्य परीक्षा हेतु चतुर्विध परीक्षा में युक्ति का भी निर्देश किया है –

“द्विविधमेव खलु सर्वं सच्चासच्च । तस्य चतुर्विध परीक्षा । आप्तोपदेशप्रत्यक्ष , अनुमानयुक्तिश्चेति ।। “( च ० सू ० 11/17 )

इसी प्रकार पुर्नजन्म सिद्धि में भी युक्ति प्रमाण का उल्लेख किया है ।

अनुमान के लक्षण में युक्ति को अनुमान प्रमाण की सिद्धि कराने वाला साधन ही स्वीकार किया है ।
अत : यह सिद्ध होता है कि योजना युक्ति की आवश्यकता समझते हुए उसे प्रमाण रूप में भी स्वीकार किया है एवं जहां तीन प्रमाणों से ही सिद्धि का उल्लेख किया है वहां युक्ति को अनुमान के अन्तर्भावित कर लिया है ।

परादि गुणों में युक्ति को एक गुण विशेष के रूप में भी स्वीकार किया है ।

आयुर्वेद में युक्ति प्रमाण की उपयोगिता-

1 ) स्वास्थ्य रक्षण एवं रोगों का दूरीकरण यह आयुर्वेद के दो लक्ष्य हैं । इनके लिए जो साधन प्रयोग में आते हैं उनका परीक्षण ‘ युक्ति द्वारा ही किया जाता है । स्वस्थ रहने के लिए समदोष , सम अग्नि , समधातु , सममल तथा क्रियाएं एवं आत्मा , मनस् एवं इन्द्रिय की प्रसन्नता अपेक्षित है । दोष , अग्नि आदि की समता के लिए आवश्यक तथ्यों यथा आहारमात्रा , द्रव्यों की लघुता गुरूता , व्यक्ति का बलाबल पथ्यापथ्य आदि का ज्ञान और व्यवस्था आदि युक्ति के द्वारा ही की जाती है।

2) अनुमानगम्य विषय के ज्ञानप्राप्ति में एक वैज्ञानिक पद्धति के रूप में यह उपयोगी है ।

3) पदार्थ एवं तत्वों की सिद्धि का ज्ञान तो युक्ति द्वारा किया ही जाता है रोगी रोग परीक्षा , औषध निर्माण आदि में भी युक्ति की ही प्रधानता देखी जाती है ।

4 ) परादि गुणों में युक्ति द्वारा ही समस्त योजना तैयार की जाने से इसका विशेष महत्व होता है।

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