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YANTRA VIDHI

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यंत्र विधि भाग-2

• नलिका और पिच्छनलिका यंत्र-

उदकोदर ( जलोदर- Ascitis ) रोग में जल निकालने के लिये दो मुख वाली नलिका बनाते हैं या मोर के पिच्छ ( पंख ) की नली बनाना चाहिये ।

• धूमादि यंत्र-

 धूम और बस्ति आदि यन्त्र को उनके अध्यायों ( यथायथम् ) में वर्णित कर दिया गया है । शृंग यन्त्र- -शृंग यंत्र तीन अंगुल लम्बा मुख वाला होना चाहिये , इसकी लम्बाई अट्ठारह अंगुल और सिरे पर सरसों ( सिद्धार्थक ) के आकार का छिद्र होना चाहिये । यह यंत्र रक्तादि के आचूषण ( Sucking ) के काम आता है , यह ठीक से बंधा हुआ और आकार में चूचुक ( Nipple ) के समान होना चाहिये ।

• अलाबू यन्त्र-

अलाबू ( तुम्बी ) की लम्बाई बारह अंगुल , चौड़ाई अट्ठारह अंगुल और इसके मुख की गोलाई तीन और चार ( मुख के गोलाई की परिधि चतुस्त्यंगुल चार गुणे तीन अर्थात् बारह ) अंगुल होनी चाहिये । इसके ( अलाबू के ) अन्दर अग्नि ( पिचु में ) आदि जलाकर ( गर्मी से वायु निकल जाये ) लगाते हैं इसके द्वारा कफ से दूषित रक्त को निकाला जाता है ।

• घटीयन्त्र-

यह भी अलाबू के समान होता है , इसे गुल्म ( Tumour ) के विलयन ( Disolve ) करने और उन्नमन ( उठाने ) करने में प्रयुक्त किया जाता है ।

• शलाकायन्त्र-

 ये अनेक प्रकार के कार्य करने के लिये अनेक प्रकार के होते हैं । इनका प्रमाण ( लम्बाई – चौड़ाई – मोटाई ) आवश्यकतानुसार होता है ।

इसमें एषण – ढूढ़ने के कार्य के लिये केचूये के मुख ( गण्डूपदमुखे ) के आकार की दो शलाकायें होती है । स्रोतों के शल्य ( Foreign – body ) को निकालने के लिये मसूर के पत्ते के समान मुख वाली दो शलाकायें आठ या नौ अंगुल लम्बी होती हैं ।

• शङ्कयन्त्र-

 यह छ : ( ६ ) होते हैं । इनमें से दो सोलह और बारह अंगुल के होते हैं जो व्यूहन ( शल्य को देखने या निकालने ) कार्य करते हैं , ये सर्प के फण के मुख के समान होते हैं । दो शंकु यंत्र दस और बारह अंगुल के होते हैं , जो चालन का कार्य ( शल्य को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना ) करते हैं , इसका मुख शरपुंख ( बाण ) के समान होता है ।

• गर्भशङ्क यन्त्र-

आगे से झुका हुआ , शङ्ख के आकार का और आठ अंगुल लम्बा गर्भशङ्ख होता है , इससे स्त्री के गर्भ ( Obstructed foetus ) को बाहर निकालते हैं ।

• सर्पफणा यन्त्र-

यह यन्त्र अश्मरी ( Stones ) को निकालने के लिये आगे से सर्प के फन के समान टेढ़ा होता है ।

• शरपुङ्खमुख यन्त्र-

यह शङ्ख यन्त्र शरपुङ मुख ( बाण ) के समान होता है जो दांतों को गिराने ( निकालने ) के काम आता है , इसकी लम्बाई चार अंगुल होती है ।

•  छः शलाकायें-

छ : शलाकायें ( Rods ) जिनके सिर पर रूई ( Cotton ) लिपटा होता हो , ये प्रमार्जन ( To clean ) कार्य करती है । पायु ( गुदा- Anus ) के प्रमार्जन ( Cleaning ) के लिये दो शलाका- समीप के लिये दस अंगुल लम्बी और दूर के लिये बारह अंगुल लम्बी होती है ।

घ्राण ( Nose ) को साफ करने के लिये छ : और सात अंगुल लम्बी तथा कर्ण ( Ear ) को साफ करने के लिये दो- आठ और नौ अंगुल लम्बी शलाका होना चाहिये ।

• अनुयन्त्र-

ये उन्नीस ( १ ९ ) प्रकार के होते हैं- ( १ ) अयस्कान्त ( चुम्बक- Magnet ) , ( २ ) रज्जू ( रस्सी ) , ( ३ ) वस्त्र , ( ४ ) अश्म ( पत्थर ) , ( ५ ) मुद्गर , ( ६ ) वध्र , ( ७ ) आन्त्र , ( ८ ) जिह्वा , ( ९ ) बाल ( Hairs ) , ( १० ) शाखा , ( ११ ) नख , ( १२ ) मुख , ( १३ ) दांत , ( १४ ) काल , ( १५ ) पाक , ( १६ ) कर ( हस्त ) , ( १७ ) पाद , ( १८ ) भय और ( १ ९ ) हर्ष । बुद्धि ( धिया ) से निपुणता के साथ विचार कर चिकित्सक को आवश्यकतानुसार इन क्रियाओं का उपयोग करना चाहिये ।

• यन्त्रों के कर्म –

निर्घातन ( चोट करना , मारकर गिराना ) , उन्मथन ( मथना ) , पूरण ( Healing- भरना ) , मार्गशुद्धि , संव्यूहन ( हिलाना – डुलाना ) , आहरण ( खींच कर निकालना- Extraction ) , बन्धन ( बांधना- Bandaging ) , पीडन ( दबाना ) , आचूषण ( To suck ) , उन्नमन ( उपर उठाना ) , नमन ( झुकाना ) , चालन ( हिलाना ) , भङ्ग ( तोड़ना ) , व्यावर्तन ( घुमाना ) और ऋजुकरण ( सीधा करना ) ये यन्त्र के कर्म है ।

• कंकमुख यंत्र का महत्त्व-

कंकमुख सभी यंत्रों में श्रेष्ठ होता है क्योंकि यह अच्छी तरह से घूम सकता ( विवर्तते ) है , अच्छी प्रकार गहराई तक पहुंच जाता है , पकड़ने वाली वस्तु ( शल्य ) को पकड़ कर बाहर कर सकता है और सभी स्थानों में बिना विकार विकृति ) उत्पन्न किये इसका प्रयोग किया जा सकता है।

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