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YANRA VIDHI

by

यंत्र विधि भाग-1

• यन्त्रों का वर्णन-

अनेक प्रकार के शल्यों ( Foreign body ) को जो शरीर के अनेक स्थानों को पीड़ित ( कष्ट देने ) करने वाले हैं उन्हें निकालने ( आहर्तु ) के जो उपाय ( साधन ) हैं , उन्हें ‘ यन्त्र ‘ कहते हैं । जो अर्श ( Piles ) , भगन्दर ( Fistula ) आदि को देखने के लिये शस्त्र ( Instruments ) , क्षार ( Alkali ) और अग्नि कर्म में प्रयुक्त होते हैं तथा अन्य अङ्गों की रक्षा और बस्ति ( Enema ) आदि कर्मों में प्रयुक्त होते हैं- घटिका , अलाबू सींग ( Horn ) और जाम्बवौष्ठ आदि भी यंत्र हैं ।

• रूप और कार्यों के अनुसार यन्त्र-

अनेक रूप ( Shape ) और कार्यों के आधार पर यन्त्र अनेक होते हैं । अत : अपनी आवश्यकता और बुद्धि के अनुसार यन्त्रों की कल्पना कर सकते हैं , जैसे- मोटे आदि यंत्रों का वर्णन किया गया है।

• स्वस्तिक यंत्रों के स्वरूप और कार्य-

यह यंत्र कंक ( वक- Heron ) , सिंह ( Lion ) , ऋक्ष ( Bear ) और काक ( Crow ) आदि पशु – पक्षियों के मुखों के समान मुख वाले यन्त्रों को उन्हीं के नाम से कहे गये हैं । ये अठ्ठारह अंगुल लम्बे और प्राय : लोहे से बनाये जाते हैं । इसका कण्ठ मसूर के आकार के कील से बंधा होता है अर्थात् इसका ( यंत्र का ) कण्ठ मसूर के आकार की कीलों से जुड़ा होता है । ये स्वस्तिक यंत्र मूल में ( पकड़ने के स्थान पर ) अंकुश के समान जुड़े होते हैं । इन मजबूत यंत्रों से अस्थि ( Bone ) में फंसे शल्य को निकालना चाहिये ।

• सदंश यंत्रों के स्वरूप और कार्य-

सन्दन्श यंत्र कील से आगे जुड़ा हुआ ( बद्ध ) या खुला हुआ और सोलह ( १६ ) अंगुल लम्बा होता है । इससे त्वचा ( Skin ) , शिरा ( Veins ) , स्नायु और मांस ( Muscles ) में फंसे शल्य ( Foreign – body ) को खींच कर बाहर निकाला जाता है ।

 दूसरा संदंश छ : अंगुल का होता है , यह सूक्ष्म शल्य और पलकों ( Eye – Lashes ) के अतिरिक्त नेत्र में निकलने वाले अन्य बालों ( उपपक्ष्म ) को निकालने के काम में आता है ।

• यंत्र ( Forcep ) – यह सूक्ष्म दांतों वाला और सीधा होता है , इसके जड़ में गोल ( रुचक ) छल्ला होता है । इससे गहरे व्रणों ( Abscess ) के मांस , अर्म ( अधिमांस ) और काटने पर शेष बचे मांस को निकाला जाता है ।

• ताल यंत्र- ताल यंत्र दो प्रकार के होते हैं- ( १ ) एक ताल और ( २ ) द्विताल , इनकी लम्बाई बारह अंगुल और एक ताल मछली के तालू के समान होता हैं , और दूसरे में दोनों सिरे पर ताल ( Spoon – like ) होता है ।

• नाडी यंत्र-

ये खोखले ( सुषिर ) एक या अनेक मुख वाले होते हैं । इनका उपयोग स्रोतों में स्थित शल्यों और रोगों ( आमयानाम् ) को देखने , सुविधा से कार्य करने ( क्रियाणां- शल्य , क्षार , अग्नि कर्म आदि ) और आचूषण ( Sucking ) में होता है । इसकी चौड़ाई ( विस्तार ) , मोटाई ( परिणाह ) और लम्बाई स्रोतों के अनुसार होती है ।

• अन्य नाडी यंत्र-

दश अंगुल लम्बे और पांच अंगुल मोटाई वाले नाड़ी यंत्र को कण्ठ ( Throat ) के अन्दर के शल्य को देखने के लिये प्रयुक्त किया जाता है ।

• अर्श यंत्र-

यह यंत्र गाय के स्तन के आकार का चार अंगुल लम्बा , पुरुषों के लिये पांच अंगुल मोटा और स्त्रियों के लिये छ : अंगुल मोटा होना चाहिये ।

इसमें दो छिद्र होते हैं- एक रोग को देखने के लिये और दूसरा छिद्र कर्म ( छेदन ) करने के लिये होता है । इस यंत्र के मध्य में तीन अंगुल का एक छिद्र ( Hole ) होता है जो अंगूठे के मध्य भाग के बराबर ( अंगुष्ठ उदर ) मोटा होता है इसके उपर आधा अंगुल ऊंची उठी हुयी कर्णिका होती है ।

• शमी यंत्र-

यह यंत्र भी अर्श यंत्र के समान होता है , किन्तु इसमें छिद्र नहीं होता है , इसका प्रयोग अर्श ( Piles ) को दबाने के लिये होता है ।

• भगन्दर ( Fistula ) यंत्र-

इस ( अर्श ) यंत्र में छिद्र के उपर के भाग में से पार्श्व भाग के ओष्ठ को सम्पूर्ण रूप से हटा देना चाहिये । नासा यंत्र- प्राणार्बुद ( Nasal tumour ) और घ्राणार्श ( Nasal – polyp ) में एक छेद वाली और दो अंगुल लम्बी नाडी ( Nosel ) होना चाहिये ।

इसकी मोटाई प्रदेशिनी अंगुली ( Index – finger ) के बराबर होनी चाहिये । यह यंत्र भगन्दर यंत्र जैसा होता है ।

• नासा यंत्र-

प्राणार्बुद ( Nasal tumour ) और घ्राणार्श ( Nasal – polyp ) में एक छेद वाली और दो अंगुल लम्बी नाडी ( Nosel ) होना चाहिये । इसकी मोटाई प्रदेशिनी अंगुली ( Index – finger ) के बराबर होनी चाहिये । यह यंत्र भगन्दर यंत्र जैसा होता है ।

• अङ्गुलित्राणक यंत्र-

यह यंत्र दांत या लकड़ी ( वार्त ) का बना और चार अंगुल लम्बा होना चाहिये । इसमें दो छिद्र होते हैं और इसका आकार गाय के स्तन जैसा होता है , इसे मुख ( वक्त्र ) को आसानी से खोलने ( विवृतौ ) के लिये प्रयोग में लाते हैं ।

• योनिव्रणेक्षण यंत्र-

यह यंत्र बीच में खोखला ( सुषिर ) , सोलह अंगुल लम्बा , मुद्रिका ( गोल ) से बंधा हुआ , चार दीवालों वाला , कमल की कली के मुख के समान आकार का , मूल में चार शलाकायें ( Rods ) ऐसा जुड़ा हों जिसे दबाने से वह यंत्र मुख ( योनि ) पर खुल जाये ।

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