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Vish Ka Svaroop

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विष का स्वरूप  भाग 1

(Nature of Poison )

• विष की निरुक्ति ( Etymology of Visha – Poison )

विष शब्द ‘ विप् ‘ धातु में ‘ क ‘ प्रत्यय लगकर बना है । विष का अर्थ है – घेरना , छा जाना अथवा व्याप्त हो जाना या फैलना ।

अतः विष का व्युत्पत्ति – लब्ध अर्थ हुआ – वह द्रव्य जो शरीर में जाकर शीघ्रता से व्याप्त हो जाये ।

 • विष की प्रागुत्पत्ति ( ( First Origin / Mythological Origin of Poison )

पौराणिक परम्परा के अनुसार विष की सर्वप्रथम उत्पत्ति क्षीरसागर या समुद्र से हुई ।

• आचार्य चरक मतेन

अमृत को प्राप्त करने की इच्छा से जब देव और दानव मिलकर क्षीरसमुद्र का मन्थन कर रहे थे , तब अमृत की उत्पत्ति होने के पूर्व उसमें से एक भयानक स्वरूपवाला पुरुष प्रकट हुआ । वह अत्यन्त तेजस्वी था । उसके चार बड़े – बड़े दाँत थे । हरित वर्ण के केश थे । उसके नेत्रों से अग्नि समान ज्वालाएँ निकल रहीं थीं । उसे देखकर सम्पूर्ण जगत् अर्थात् वहाँ उपस्थित सभी लोग विषादयुक्त हो गये । इसीलिए उसकी विष संज्ञा हुई ।

जब ब्रह्माजी ने देखा कि उस भयानक विष – पुरुष को देखकर सभी प्राणी अत्यन्त दु : खी हो रहे हैं तो उन्होंने अग्नि के समान दाहक उस विष पुरुष को स्थावर और जंगम दो योनियों में स्थापित कर दिया ।

• आचार्य सुश्रुत मतेन

जब स्वयम्भू ब्रह्मा सृष्टि की रचना कर रहे थे , उस समय दर्प में चूर कैटभ नाम का दैत्य आकर विघ्न उपस्थित करने लगा । तेज के पुंज ब्रह्माजी अत्यधिक क्रुद्ध हो गये । क्रोध स्वयं अत्यधिक दारुण रूप धारण कर उनके मुख से प्रकट हुआ । इस क्रोधरूपी पुरुष ने उस महाबली गर्जन – तर्जन करने वाले राक्षस का वध कर डाला ।

उस राक्षस का वध करने के उपरान्त शरीरधारी क्रोध का वह तेजस्वी स्वरूप विचित्र रूप में बढ़ने लगा । उसे देखकर देवता विषादयुक्त हो गये । विषाद उत्पन्न करने के कारण ही उसका नाम विष पड़ा । फिर शेष प्राणियों की सृष्टि कर लेने के उपरान्त ब्रह्मा जी ने उस क्रोध को स्थावर एवं जंगम भूतों में स्थापित कर दिया ।

• विष की परिभाषा ( Definition of Poison )

‘ जो द्रव्य प्राणी के मनोदैहिक तन्त्र के सम्पर्क में आकर अथवा उसके शरीर में प्रवेश कर विषाद उत्पन्न करे या प्राणों को हर ले , उसे विष कहते हैं । ‘

•आचार्य सुश्रुत मतेन

” विषादजननत्वाच्च विषमित्यभिधीयते ।।” ( सु.क. 3/21 )

विषाद उत्पन्न करने के कारण उसे ‘ विष ‘ कहा जाता है ।

•आचार्य चरक मतेन

“जगद्विषण्णं तं दृष्ट्वा तेनासौ विषसंज्ञितः ।।” ( च.चि. 23/5 )

जिसे देखकर जगत् के सभी प्राणि – विशेष विषादग्रस्त / खिन्न हो जाते हैं , उसे ‘ विष ‘ कहते हैं ।

• विष के पर्याय ( Synonyms of Poison )

आचार्य कविराज  मतेन

1.क्ष्वेड 

2.गरल 

अमरसिह सदानन्द शर्मा मतेन

1.क्ष्वेड

2.गरल

3.कालकूट

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