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विपाक

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विपाक

•निरुक्ति

" विशिष्ट : जरणनिष्ठाकाले रसविशेषस्य पाक : प्रादुर्भावः विपाकः । "

प्राचनक्रिया के अन्त में उत्पन्न विशिष्ट रस को विपाक ‘ कहते हैं।
• पर्याय -निष्ठापाक

•लक्षण

"जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम् । रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ।। "(अ.ह.सू. 9/20)

रसयुक्त द्रव्यों का जठराग्नि द्वारा पाक हो जाने के पश्चात् जो रसान्तर अन्य रस उत्पन्न होता है वह ‘ विपाक ‘ कहलाता है ।

•संख्या
आचार्य चरक एवं वाग्भट मतेन
“स्वादुः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः । तिक्तोषणकषायाणां विपाकः प्रायशः कटुः ।।” (अ.हृ.सू. 9/21 )
विपाक तीन प्रकार का होता है ।
1.मधुर विपाक ( मधुर + लवण )
2.कटु विपाक ( अम्ल )
3.अम्ल विपाक ( तिक्त + कटु + कषाय )

आचार्य सुश्रुत मतेन – 2

आगम प्रमाण एवं पञ्चमहाभूतों के आधार पर मधुर एवं कटु भेद से विकार दो प्रकार होता है । इनमें मधुर विपाक गुरु तथा कटु विपाक लघु होता है ।
पञ्चमहाभूतों के गुणों की साम्यता से गुरु या लघु विपाक होता है अर्थात् पृथिवी और जल महाभूत के कारण गुरु विपाक एवं शेष तीन अग्नि , आकाश , वायु के कारण लघु विपाक होता है ।

• मधुर विपाक कफ दोष को बढ़ाने वाला होता है तथा यह गुरु होता है और शुक्रल होता है।

• अम्ल विपाक पित्त दोष को बढ़ाने वाला होता है तथा यह लघु होता है और शुक्र का नाश करने वाला होता है।

• कटु विपाक वात दोष को बढ़ाने वाला होता है तथा यह भी लघु होता है और शुक्र का नाश करने वाला होता है।

•विपाक और उनके स्वभाव

  • मधुर विपाक स्वभाव में गुरु होता है ।
  • अम्ल विपाक स्वभाव में लघु होता है।
  • कटु विभाग स्वभाव में लघु होता है।

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