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VEERYA DRVYAGUNA

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वीर्य

“येन कुर्वन्ति , तद्वीर्यम् ।”
( च.सू. 26.13)


जिससे कार्य करते हैं वह वीर्य है ।

• "वीर्य शक्तिर्येन द्रव्यं कुरुते कर्म सर्वदा । नावीर्यं कुरुते किञ्चित् सर्वा वीर्यकृताः क्रियाः ।।"
( प्रि.नि.द्रव्यादिवर्ग .39)


वीर्य वह शक्ति है जिससे द्रव्य अपना कर्म करने में समर्थ होता है । बिना वीर्य के कोई द्रव्य कर्म नहीं कर सकता क्योंकि सभी कर्म वीर्य से ही सम्पन्न होते हैं ।

• द्विविध वीर्य


"उष्णशीतगुणोत्कर्षात्तत्र वीर्यं द्विधा स्मृतम् ।"
(अ.हृ.सू. 1/17)


वीर्य दो प्रकार का होता है 1.उष्ण तथा 2.शीत

•द्विविध वीर्य के कर्म –
• उष्ण वीर्य के कर्म
भ्रम

  • तृड् ग्लानि
  • स्वेद
    -दाह
  • आशुपाक
  • वातकफशमन

•शीत वीर्य के कर्म

  • हलादन
    -जीवन
    -स्तम्भ
    -रक्त एवं पित्त प्रसादन

•अष्टविध वीर्य
1 शीत वीर्य – पृथिवी + जल
2 उष्ण – अग्नि
3 स्निग्ध – जल
4 रूक्ष -वायु
5 गुरु- पृथिवी + जल
6 लघु- अग्नि + वायु + आकाश
7 मृदु – जल + आकाश
8 तीक्ष्ण – अग्नि

•आचार्य सुश्रुत ने सूत्रस्थान के 41 वें अध्याय में गुरु एवं लघु के स्थान पर पिच्छिल और विशद को वीर्य कहा है । पिच्छिल वीर्य में जल तथा विशद वीर्य में पृथिवी + वायु की प्रधानता होती है ।

•पञ्चदश वीर्य
-आचार्य निमि मतेन – 15
•वीर्य की उपलब्धि में हेतु


"वीर्यं यावदधीवासान्निपाताच्चोपलभ्यते ।।"
( च.सू. 26.66)


द्रव्यगत वीर्य का ज्ञान शरीर के साथ सम्बन्ध ( निपात ) होने से लेकर जब तक वह शरीर के अन्दर रहता है ( अधिवास ) , तब तक शरीर पर होने वाली उसकी क्रियाओं द्वारा होता है ।

•वीर्य की प्रधानता

  • सन्दर्भ – रसवैशेषिक
    ( 1 ) आप्तोपदेश
    ( 2 ) तुल्यरसगुणेषु विशेषात्
    ( 3 ) कर्मकारणात्
    ( 4 ) वीर्यप्राधान्याद् द्रव्याणाम्

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