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Vati Kalpana

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वटी कल्पना

वटी कल्क और चूर्ण कल्पना का ही विकसित स्वरूप है । जो द्रव्य अप्रिय रस या अप्रिय गन्ध वाले होते हैं , उनको आसानी से निगलने के लिए , साथ ही निश्चित मात्रा में प्रयोग हेतु तथा औषध के गुण – वीर्य अधिक समय तक सुरक्षित रहे , इस उद्देश्य से वटी बनायी जाती है । साधारण भाषा में इन्हें गोलियाँ ( Pills ) कहा जाता है ।

• वटी के पर्यायवाची शब्दः-

आकृति , परिमाण , प्रयोगमार्ग आदि के विचार से वटी को वटक , वटिका , गुटिका , चक्रिका , मोदक , पिण्ड , पिण्डी , गुड और वर्ति कहा जाता है ।

• वटी निर्माण परिभाषा

वटी निर्माण की तीन विधियाँ है :

1. गुड अथवा शर्करा अथवा शुद्ध गुग्गुलु को अग्नि पर चढ़ाकर लेहवत् पाक करके उसमें चूर्ण डलिकर वटी बना लेते हैं।

 2. कभी – कभी बिना अग्निसंयोग के गुग्गुलु के साथ औषधचूर्ण को मिलाकर वटी बना लेते हैं ।

 3. औषध चूर्ण में द्रव ( क्वाथ , स्वरस , गोमूत्र , आदि ) , मधु आदि की भावना देकर भी वटी बना ली जाती है ।

 • प्रक्षेप द्रव्य :

वटी निर्माण में शर्करा डालनी हो तो चूर्ण से चतुर्गुण , गुड डालना हो तो द्विगुण , गुग्गुलु और मधु चूर्ण के समान मात्रा में मिलाना चाहिए । द्रव ( जल , स्वरस , गोमूत्र , क्वाथ आदि ) चूर्ण से द्विगुण मिलाना चाहिए ।

• वटी की मात्रा

वटी की सामान्य मात्रा एक कर्ष ( 12 ग्राम ) हैं , किन्तु रोग , रोगी एवं औषधियों के बलाबल का विचार करके वटी की मात्रा निर्धारित करनी चाहिए ।

• अनुपान : –

वटियाँ प्रायः किसी द्रव ( जल , दुग्ध , स्वरस , क्वाथ , शार्कर आदि ) के अनुपान से ली जाती है ।

• चित्रकादि वटी

घटक द्रव्य :

1. चित्रक मूल 1 भाग

2. पिप्पलीमूल 1 भाग

3. यवक्षार 1 भाग

4. स्वर्जिक्षार 1 भाग

5. सौवर्चल लवण 1 भाग

6. विड़ लवण 1 भाग

7. सैन्धव लवण 1 भाग

8. सामुद्र लवण 1 भाग

9. औद्भिद लवण 1 भाग

10. शुण्ठी 1 भाग

11. मरिच 1 भाग

12. पिप्पली 1 भाग

13. शुद्ध हींग 1 भाग

14. अजमोदा 1 भाग

15. चव्य 1 भाग

• भावना द्रव्य :

 मातुलुङ्ग स्वरस अथवा दाडिमफल स्वरस – यथावश्यक

• निर्माण विधि : –

उपरोक्त सभी द्रव्यों को पृथक् – पृथक् सूक्ष्म चूर्ण बनाकर एवं खरल में डालकर मातुलुङ्ग नींबू या दाडिम स्वरस की भावना देकर मर्दन करें । फिर 4-4 रत्ती की गोलियाँ बना सुखाकर काँच के जार में सुरक्षित रखें ।

•मात्रा : 4 रत्ती

अनुपान : – उष्ण जल , तक्र

• मुख्य उपयोग : – अग्निमान्द्य , आमदोष , ग्रहणी ।

• सञ्जीवनी वटी :

घटक द्रव्यः

1. विडङ्ग -1 भाग

2. शुण्ठी 1 भाग

3. पिप्पली 1 भाग

4. हरीतकी 1 भाग

5. बिभीतक -1 भाग

6. आमलकी 1 भाग

7. वचा -1 भाग

8. गुडूची 1 भाग

9. शुद्ध भल्लातक 1 भाग

10. शुद्ध वत्सनाभ 1 भाग

भावना द्रव्य : – गोमूत्र यथावश्यक

निर्माण विधि : –

 उपरोक्त सभी द्रव्यों को पृथक् – पृथक् इमामदस्ते में डालकर वस्त्रपूत सूक्ष्म चूर्ण करें । फिर खरल में डालकर गोमूत्र की भावना देते हुए मर्दन करें बाद में जब वर्ति बनने लग जाये तब 1-1 रत्ती की गोलियाँ बनाकर और सुखा कर काँच के जार में सुरक्षित रखें ।

मात्रा : अजीर्ण और गुल्म -1रत्ती

विसूचिका- 2 रत्ती

सर्पदंश -3रत्ती

सन्निपात ज्वर- 4रत्ती

अनुपान : – आईक स्वरस

मुख्य उपयोग : – अजीर्ण , गुल्म , सर्पदंश , विसूचिका एवं सन्निपात ज्वर ।

• अर्कवटी

घटक द्रव्य :

1. सौवर्चल लवण 1 भाग

2. शु . नवसादर 1 भाग

3. अर्कपुष्प 1 भाग 

4. मरिच 1 भाग

निर्माण विधिः –

सर्वप्रथम अर्कपुष्प को छोड़कर सभी द्रव्यों को इमामदस्ते में डालकर सूक्ष्म चूर्ण का निर्माण करें । फिर खरल में आर्द्र अर्कपुष्प डालकर धीरे – धीरे चूर्ण को मिलाते हुए मर्दन करें । अन्त में 2-2 रत्ती की गोलियाँ बनाकर एवं छाया में सुखाकर काँच पात्र में सुरक्षित रखें ।

मात्रा : -500 मि.ग्रा .

 अनुपान : -जल

 मुख्य उपयोग : -कफज अग्निमांद्य , गुल्म , अजीर्ण , अम्लपित्त ।

• लवङ्गादि वटी :

घटक द्रव्यः

1. लवङ्ग 1 भाग

2. मरिच 1 भाग

3. बिभीतक फलत्वक् 1 भाग

4. खदिरसार ( कत्था ) -3 भाग

भावना द्रव्य : बब्बूल वृक्षत्वक् क्वाथ – यथावश्यक

निर्माण विधि : – उपरोक्त द्रव्यों का इमामदस्ते में पृथक् – पृथक् सूक्ष्म चूर्ण बना खरल में डालकर बब्बूलवृक्षत्वक् स्वरस या क्वाथ की भावना देकर भली भाँति मर्दन करके 4-4 रत्ती की गोलियाँ बनाकर छाया शुष्क कर काँच के जार में सुरक्षित रखें ।

मात्रा : -4 रत्ती की वटी चूषणार्थ ।

मुख्य उपयोग : – कास , श्वास ।

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