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Varti Kalpana

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वर्तिकल्पना

वर्ति कल्पना वटी कल्पना के अन्तर्गत आती है । वर्ति प्रायः दोनों किनारों पर पतली और बीच में थोड़ी मोटी यवाकृति ( जौ के समान आकृति ) के समान होती है ।

 कभी – कभी एक समान लम्बी आकृति की गोलाकर भी होती है । इन वर्तियों के प्रयोग से वात का अनुलोमन तथा सञ्चित दोषों ( मल – मूत्र – कफ – रक्त आदि ) का निष्कासन हो जाता है । वर्ति रोग , रोगी , स्थान , दोष एवं कर्म आदि के भेद से अनेक प्रकार की होती है ।

यथा :

1. गुदवर्ति या फलवर्ति

2. योनिवर्ति

3. शिश्नवर्ति

4. नेत्रवर्ति

5. नासावर्ति

6. व्रणवर्ति

7. धूमवर्ति

• 1. गुदवर्ति ( Rectal suppository ) : –

 गुदा में संचित शुष्क मल , प्रकुपित वायु , गुदा में रुका हुआ बस्ति द्रव अथवा गुदा में अवरूद्ध अन्य दोष , दृष्य आदि को बाहर निकालने के लिए गुदवर्ति ( फलवर्ति ) का प्रयोग किया जाता है ।

गुदवर्ति का निर्माण रेचक एवं वातानुलोमक औषधों का सूक्ष्म चूर्ण बनाकर क्षार एवं लवण मिश्रित कर , गुडपाक करके उसमें चूर्णों को डालकर अंगुष्ठ प्रमाण की ( अंगूठे की जितनी मोटी एवं लम्बी ) स्निग्ध वर्ति बनायी जाती है । इसे गुदवर्ति कहते हैं ।

2. योनिवर्ति ( Vaginal suppository – pessary ) :

स्त्रियों के गर्भाशय सम्बन्धी विकारों जैसे – प्रदर , गर्भस्राव , गर्भाशय शूल , गर्भाशय शोथ , गर्भाशय व्रण आदि में शोधन और दोषहरण हेतु स्त्रियों के अपत्यपथ में योनिवर्ति का प्रयोग किया जाता है ।

3. शिश्नवर्ति ( Urethral Bougies ) : –

यह वर्ति पुरुष के शिश्न छिद्र ( मूत्रेन्द्रिय ) में प्रवेश के लिए बनायी जाती है । इसके प्रयोग से मूत्रकृच्छ्र , मूत्राघात , अश्मरी , मूत्राशय शूल , पूयमेह तथा उष्णवातादि रोग नष्ट हो जाते हैं ।

4. नेत्रवर्ति

 नेत्ररोगों जैसे – तिमिर , काच , अधिमन्थ , रात्र्यन्ध , पोथकी , अञ्जननामिका आदि रोगों में तीक्ष्ण , रूक्ष , कटु और लेखन औषधियों ( शंखनाभि , विभीतक फलमज्जा , त्रिकटु , कुष्ठ , तुत्थ , वचा आदि ) से यवाकार वर्ति बनाकर प्रयोग किया जाता है । जैसे – चन्द्रोदयवर्ति ।

5. नासावर्तिः –

 शिरोरोग यथा शिरः शूल , शिरोकृमि तथा नासारोगों यथा प्रतिश्याय , पीनस आदि रोगों में नासामार्ग का शोधन करने हेतु नासावर्ति का प्रयोग किया जाता है । इसके लिए तीक्ष्ण एवं कृमिघ्न द्रव्यों यथा अपामार्ग बीज , विडंग , शिरीष बीज , कट्फल , मरिच आदि द्रव्यों के सूक्ष्म चूर्ण को वस्त्र में लपेटकर ( वर्ति के आकार में लम्बी बनाकर ) नासा में प्रवेश करने पर खूब छींक आती है तथा उपर्युक्त रोग नष्ट हो जाते हैं।

6. व्रणवर्ति : –

पक्व व्रणों में से या शस्त्रकर्म के पश्चात् व्रण के छिद्रों में से भली प्रकार पूय ( Pus ) नहीं निकलने से उनमें शोथ , लालिमा , वेदना आदि कष्ट हो जाते हैं तथा व्रणों का रोपण नहीं होता है तो निम्बपत्र , हरिद्रा , स्फटिका , तुत्थ आदि द्रव्यों को पीसकर पतली वर्ति बनाकर या वस्त्रवर्ति बनाकर व्रणछिद्र में प्रवेश करायी जाती है , जिससे दूषित रक्त व पूय का निर्हरण होकर नाडीव्रण , सूक्ष्म मुख वाले व्रों का भी रोपण हो जाता है ।

7. धूमवर्ति : –

ऊर्ध्वजत्रुगत रोगों तथा पीनस , शिरःशूल , मन्यास्तम्भ , दन्त एवं मुखरोग , श्वास , कास , हिक्का तथा कफवातज रोगों में तत्तद्रोगहर द्रव्यों ( जटामांसी , हरेणु , प्रियंगु , ज्योतिष्मति , अपराजिता , मनः शिला आदि ) को पीसकर वर्ति बना ली जाती है और उस धूमवर्ति को धूमनेत्र में रखकर प्रयोग करते हैं , जिससे उपरोक्त ऊर्ध्वजत्रुगत रोगों का शमन होता है ।

• फलवर्तिः

घटक द्रव्य ‘ :

1. मदनफल 10 ग्राम

2. पिप्पली 10 ग्राम

3. कुष्ठ 10 ग्राम

4.वचा 10 ग्राम

5. श्वेत सर्षप 10 ग्राम 

6. गुड आवश्यकतानुसार

7. यवक्षार 10 ग्राम

• निर्माण विधि : –

सर्वप्रथम क्र.सं. 1 से 5 तक के द्रव्यों का पृथक् – पृथक् सूक्ष्म चूर्ण कर लें । फिर गुड में थोड़ा जल मिलाकर अग्नि पर चढ़ाकर गुडपाक करें । गुडपाक होने पर उतारकर उपरोक्त औषधियों तथा यवक्षार का चूर्ण मिलाकर अंगूठे के समान ( अङ्गुष्ठसन्निभा ) आकृति की वर्ति बनाकर शुष्क कर लें । थोड़ा सा घी भी इन पर लगा लेना चाहिए ।

 प्रयोग – उदावर्त रोग में गुदवर्ति के रूप में स्थानीय प्रयोग किया जाता है ।

• चन्द्रोदया वर्तिः

घटक द्रव्य :

1. शंखनाभि – 1 भाग

2. बिभीतक मज्जा

3. हरीतकी – 1 भाग

4. शुद्ध मनःशिला :1 भाग

5. पिप्पली – 1 भाग

6. मरिच 1 भाग

7. कुष्ठमूल 1 भाग

8. वचा 1 भाग

भावना द्रव्य :- अजा दुग्ध – यथावश्यक

निर्माण विधिः-

उपरोक्त सभी द्रव्यों का पृथक् – पृथक् सूक्ष्म चूर्ण कर खरल में डालकर अजादुग्ध से मर्दन करें । जब गोली बनाने जैसा चिकना हो जाये तब यवाकृति वर्ति बनायें । फिर इसे छाया शुष्क कर सुरक्षित रखें । आवश्यकतानुसार इस वर्ति को साफ एवं चिकने पत्थर पर शहद या जल के साथ घिसकर नेत्रों में अञ्जन करें ।

 प्रमुख उपयोगः- तिमिर , मांसवृद्धि , काच , पटल , अर्बद , अधिमांस , रात्र्यन्ध । 

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