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VAMAN VIRCHAN VIDHI

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वमन विरेचन विधि भाग – 1

• वमन – विरेचन और वमन योग्य रोग-

कफ या कफ प्रधान ( कफोल्बणे ) संयोग से होने वाले रोग में वमन ( Vomiting ) कराते है । इसी प्रकार पित्त या पित्त प्रधान रोग में विरेचन कराते हैं । वमन का विषय विशेष रूप से नूतन ज्वर , अतिसार ( Diarrhoea ) , अधोग रक्तपित्त , राजयक्ष्मा , कुष्ठ ( Skin Disease ) , प्रमेह , अपची , अन्थि , श्लीपद ( Elephantiasis ) , उन्माद , कास ( Cough ) , श्वास ( Dyspnoea ) , हल्लास ( मिचली- Nausea ) , विसर्प , स्तन्य दोष और जत्रु ( Clavicle ) के ऊपर के रोगों में वमन कराना चाहिये ।

• वमन के योग्य –

जिसने विष पान किया हो , सर्प आदि ने काटा हो , दग्ध ( जला हुआ ) , विद्व ( चोट लगा हुआ ) ,विरूद्ध अन्न और अजीर्ण में भोजन करने पर , नूतन ( नया ) ज्वर , राजयक्ष्मा , अतिसार ( Diarrhoea ) , अधोग रक्तपित्त , विसूचिका , अलसक , अविपाक , अरुचि , अपची , अन्थिज रोग , अर्बुद ( Tumour ) , श्लीपद ( Eliphantiasis ) , मेदोरोग ( Obesity ) , गर विष , उन्माद , अपस्मार , श्वास ( Dyspnoea ) , कास ( Coughing ) , हल्लास ( मिचली- Nausea ) , विपर्स , प्रमेह , कुष्ठ ( Skin Diseases – Leprosy ) , पाण्डु ( रक्ताल्पता- Anaemia ) , वर्त्म – मुख – प्राण ( नासिका ) और कपाल के रोग , कर्ण रोग , कोथ ( सड़न- Necrosis ) , शोफ ( शोथ- Swelling ) और स्तन्य दोषादि में तथा विशेष रूप से दोषभेदीय अध्यायों में वर्णित कफज रोगों में वमन कराना चाहिये अर्थात् इन रोगों को नष्ट करने का सर्वोत्तम उपाय वमन कराना हैं । जिस प्रकार सलिल ( जल ) के निकाल देने से धान्य ( आधे तैय्यार ) नष्ट हो जाते हैं वैसे ही दोषों के निकल जाने से रोग नष्ट हो जाते है ।

• वमन के अयोग्य-

गर्भवती ( Pregnent ) , रूक्ष शरीर वाले , क्षुधित ( भूखा ) , सदा दुःखी रहने वाला , बालक , वृद्ध , कृश ( Thin ) , स्थूल ( Obese ) , हृदय का रोगी , उर : क्षत का रोगी , दुर्बल , निरन्तर वमन हो रहा हो ( प्रसक्त वमथु ) , प्लीहा ( Spleenomegaly ) – तिमिर का रोगी , जिसके कोष्ठ ( आशय ) में क्रिमि ( Worms ) हो , जिसे उर्ध्ववात हो या उर्ध्व अंग से रक्त आता हो , जिसे वस्ति ( Anema ) दिया गया हो , जिसका स्वर नष्ट हो ( हतस्वराः ) गया हो , मूत्राघात – उदर और गुल्म का रोगी , जिसे ठीक से वमन न होता हो , अग्नि की अधिकता ( अत्यग्नि ) हो , अर्श ( Piles ) , उदावर्त , भ्रम ( चक्कर आना- Dizziness ) , अष्ठीला , पार्श्वशूल और वात के रोगी को वमन नहीं करना चाहिये , किन्तु विष – गरविष पान , अजीर्ण ( Indigestion ) और विरूद्ध भोजन सेवन करने पर इन्हें भी वमन कराना चाहिये ।

• विरेचन से साध्य रोग –

गुल्म ( Tumour ) , अर्श ( Piles ) , विस्फोट , व्यङ्ग , कामला ( Jaundice ) , जीर्ण ज्वर ( Chronic Fever ) , उदर रोग , गरविष , छर्दि ( Vomiting ) , प्लीहा ( Spleenomegaly ) , हलीमक , विद्रधि ( Abscess ) , तिमिर , काच , स्यन्द ( अभिष्यन्द- Conjunctivitis ) , पक्वाशयगत पीड़ा , योनि ( Vaginal ) रोग , शुक्र रोग , कोष्ठगत रोग , कृमि ( Worms ) रोग , व्रण , वातरक्त ( वातास्त्र- Gout ) , उध्वर्ग रक्तपित्त , मूत्राघात , शकृद्ग्रह ( मलावरोध ) , कुष्ठ तथा प्रमेह के रोग जो वमन से साध्य है वही विरेचन से भी साध्य होते हैं ।

• विरेचन के अयोग्य रोगी-

नूतन ज्वर , अल्पाग्नि , अधोग रक्तपित्त , क्षतगुद ( पायु ) , अतिसार ( Diarrhoea ) , शल्य का रोगी , क्रूर कोष्ठ , अति स्नेहन हुआ और शोष ( राजयक्ष्मा ) के रोगी को विरेचन नहीं कराना चाहिये ।

• वमन विधि-

साधारण ऋतु ( दोष निर्हरण के लिये- कफ को वसन्त के चैत्र मास में , वात को प्रावृट् के श्रावण मास में और पित्त को शरद् के कार्तिक मास में नियमत : बताया गया है ) में अच्छी तरह से ( सम्यक् ) स्नेहन और स्वेदन होने पर जब व्यक्ति वमन के योग्य हो जाये तब वमन कराने से पहले दिन मछली , माष ( उड़द ) और तिल आदि खिलाते हैं जिससे कफ उत्क्लेशित हो जाता है , सुख पूर्वक सोये हुये , रात्रि में खाये हुये आहार के जीर्ण ( पाचन ) हो जाने पर पूर्वाह्न में प्रात : काल स्वस्ति पाठ कराते है ।

इसके बाद बिना भोजन दिये या पेया के साथ घृत पिलाकर कुछ स्नेहन होने के बाद यदि रोगी वृद्ध , बालक , निर्बल , नपुंसक और डरपोक हो तो दोष के अनुसार मद्य , दुग्ध , गन्ने का रस या मांसरस को आकण्ठ ( गले तक ) पिलाते है और रोगानुसार बनाई औषध को मात्रा में मधु और सेंधा नमक मिलाकर नीचे लिखे मन्त्र से अभिमन्त्रित करके कोष्ठ ( मृदु , मध्य , क्रूर ) के अनुसार पिलाते है ।

 औषध पिलाते समय रोगी का मुख पूर्व ( प्राङ्- East ) दिशा में रखते हैं ।

औषध पीने के बाद रोगी को चाहिये कि वमन की ओर मन लगाकर कुछ देर तक प्रतीक्षा ( वमन का वेग आने का ) करे । हल्लास ( मिचली- Nausea ) होने और मुख से लाला स्राव ( प्रसेक- Salivation ) होने पर वमन करना चाहिये ।

प्रवृत वेग को और अधिक बढ़ाने के लिये बिना किसी परिश्रम के अपने अंगुलियों से या एरण्ड या कमल के कोमल नाल से गले और तालु में पीड़ा पहुँचाये बिना अप्रवृत वेग को प्रवृत कराते हैं , और जो वेग आ रहा है उसे और भी बढ़ाते हुये घुटनों के बराबर ( जानुतुल्य ) ऊँचे आसन पर बैठ ( स्थित ) जाते है ।

वमन करते समय सहायक को चाहिये कि वो रोगी के दोनों पार्श्व और ललाट ( Forehead ) को पकड़े रहे और नाभि ( Umblicus ) तथा पीठ ( पृष्ठ ) को प्रतिलोम रूप से ( उल्टा – नीचे से ऊपर ) दबाता ( प्रपीडयेत् ) रहे ।

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