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VAKSHA GUHA ( Thoracic cavity )

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उरः प्रदेश या उरः गुहा या वक्षगुहा के कोष्ठांगों ( Thoracic cavity )

१. हृदय- Heart

२. फुफ्फुस- Lungs

१. हृदय

• हृ- हरति- पूरे शरीर से रक्त लेता है ।

• द- ददाति- रक्त को वापस देता है ।

• य- यच्छति – रक्त में गति होती है ।

 • उत्पत्ति

रक्त और कफ के प्रसाद रूप भागों से हृदय की निर्मिति होती है । जिसके आधार से प्राणवहा धमनियाँ रहती हैं । उसके नीचे बाँई ओर प्लीहा ( Spleen ) और फुफ्फुस ( Lungs ) हैं । दक्षिण ओर यकृत् ( Liver ) और क्लोम ( Gall – bladder ) हैं । हृदय यह विशेष करके चेतना का स्थान है । इसलिए तम से जब हृदय आच्छादित होता है , तो सब प्राणी सो जाते हैं ।

• हृदय का स्वरूप

” पुण्डरीकेण सदृशं हृदयं स्यादधोमुखम् ।

जाग्रतस्त द्विकसति स्वपतश्च निमीलति ।। “( सु.शा. ४/३१ )

अधोमुख कमल के समान हृदय होता है , जागरूक मनुष्य का हृदय विकसित रहता है । तथा निद्रित मनुष्य का हृदय संकुचित हो जाता है । महाधमनी से लगा हुआ हृदय देखने में ऐसा ही लगता है । उस Conicalorgan का Apex नीचे है और Base ऊपर है ।

• फुफ्फुस

” शोणित फेन प्रभवः फुफ्फुस । ” ( सु.शा. ४/२५ )

रक्त के फेन से फुफ्फुस की उत्पत्ति हुई है ।

• आमाशय ( Stomach )

 “ आमानाम् अन्नानाम् आशयः इति आमाशय : । “

 जो आम अत्र अर्थात् अधपके अत्र ( Semidigested food ) का आधार है वह आमाशय कहलाता है ।

• आन्त्र ( Intestine ) –

संहिता ग्रन्थों में पुरूष शरीर में ३५ व्याम तथा स्त्री शरीर में ३ व्याम क्षुद्रान्त्र की लम्बाई बताई है । उदर गुहा में लघ्वांत्र मध्य में नाभिप्रदेश में कुंडलियों के रुप में रहता है । तथा वृहदान्त्र के भाग , इसके चारों ओर रहते हैं।

• ग्रहणी ( Duodenum )

” अग्नि अधिष्ठानम् अन्नस्य ग्रहणात् ग्रहणी मता । ” ( च.चि. )

अग्नि का स्थान होने से ग्रहणी अन्न को ग्रहण करती है , उसका पाचन करती है । इसी से इसे ग्रहणी कहा जाता है । भगवान धन्वन्तरि ने इसे पित्तधरा कला कहा है ।

• यकृत ( Liver )

” गर्भस्य यकृत प्लीहानौ शोणितजौ । ” ( सु.शा. ४/२५ )

 गर्भ के यकृत और प्लीहा रक्त से निर्मित होते हैं ।

-यकृत हृदय के दक्षिण प्रदेश स्थित है ।

•  प्लीहा Spleen

 ” गर्भस्य यकृत प्लीहानौ शोणितजौ । ” ( सु.शा. ४/२५ )

गर्भ के यकृत और प्लीहा रक्त से निर्मित होते हैं ।

 प्लीहा हृदय के वाम भाग की ओर अध : प्रदेश में स्थित है ।

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