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VAAT KE VISHISHT KARAM

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वात के विशिष्ट कर्म

वात प्राण आदि भेद से पांच प्रकार का होता है।
पित्त पाच प्रकार का होता है।
श्लेष्मा पांच प्रकार का होता है।

•वायु के भेद

“प्राणोदानसमानाख्यव्यानापानैः स पञ्चधा । देहं तन्त्रयते सम्यक् स्थानेष्वव्याहतश्चरन् ।।”( च ० चि 028 / 4 )
( 1 ) प्राण , ( 2 ) उदान . ( 3 ) समान , ( 4 ) व्यान तथा ( 5 ) अपान भेद से पाँच प्रकार का वात अपने – अपने स्थानों में बिना बाधा के गमन करते हुए देह में सम्यक् प्रकार से अपने – अपने कार्यों को करता हैं।

( 1 ) प्राण वायु

“स्थानं प्राणस्य शीर्षोरः ( मूर्धारः ) कर्णजिह्वास्यनासिकाः । ष्ठीवनं क्षवथूद्गारः श्वासाहारादि कर्म च ।।”( च ० चि ० 28/5 )
शिर ( मस्तिष्क ) , उर ( वक्ष ) , कान , जिह्म , आस्य ( मुख ) तथा नासिका प्राण वायु के स्थान हैं । थूकना , छींकना , डकार लेना , श्वसन क्रिया तथा आहार निगलना इसके कर्म हैं।

(2) उदान वायु

“उदानस्य पुनः स्थानं नाभ्युरः कण्ठ एव च । वाक्प्रवृत्तिः प्रयत्नौ | बलवर्णादि कर्म च ।।”( च ० चि 028 / 6)

नाभि , उर ( वक्ष ) तथा कण्ठ उदान वायु के स्थान हैं एवं वाणी की प्रवृत्ति प्रयत्न , ऊर्ज ( उत्साह ) तथा बल वर्ण आदि का सम्पादन इसका कर्म है ।

( 3 ) व्यान वायु

“देहं व्याप्नोति सर्वं तु व्यानः शीघ्रगतिर्नृणाम् । गतिप्रसारणाक्षेपनिमेषादिक्रियः सदा ।।”( च ० चि ०28 / 7)

शीघ्र गति करने वाला व्यान वायु सम्पूर्ण देह में व्याप्त रहता है तथा गति ( चलना , फिरना आदि ) , प्रसारण ( अंगों का फैलना ) , आक्षेप ( convulsion ) , निमेष ( पलक का बन्द होना ) आदि क्रियायें सम्पादित करता है ।

प्रसारण क्रिया के अन्तर्गत आकुञ्चन तथा प्रसारण दोनों का समावेश है । इसी प्रकार निमेष क्रिया में उन्मेष का भी अन्तर्भाव है । सामान्य अवस्था में पलकें खुली रहती हैं अतः उन्मेष का उल्लेख नहीं किया गया है ।

( 4 ) समान वायु

“समानोऽग्निः समीपस्थः कोष्ठे चरति सर्वतः । अन्नं गृह्णाति पचति विवेचयति मुंचति ।। “(अ ० हृ ० सू ० 1/8 )

पाचकाग्नि के समीप रहता हुआ और समस्त कोष्ठ में विचरता हुआ समान वायु अन्न को ग्रहण कर और जठराग्नि को बल प्रदान कर उसे पचाता है तत्पश्चात् रस ( सार अंश ) और मल को पृथक् – पृथक् करता है।

( 5 ) अपान वायु

“अपानोऽपानमः श्रोणिवस्तिमेढ़ोरुगोचरः । शुक्रार्तवशकृन्मूत्रगर्भनिष्क्रमणक्रियः ।।”( अ ० हृ ० सू ० 12/9)

अपान वायु श्रोणि [ pelvicregion ] , गुदा , मूत्राशय , मूत्रेन्द्रिय , वंक्षण तथा ऊरु में विचरता हुआ शुक्र , आर्तव , पुरीष , मूत्र एवं गर्भ को [ वेगकाल ] में बाहर निकालने का कार्य करता है

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