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VAACHY PRYOG

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•वाच्य प्रयोग

संस्कृत में वाच्य तीन हैं- कर्तृवाच्य , कर्मवाच्य और भाववाच्य ।
सकर्मक धातुओं के रूप दो वाच्यों में होते हैं – कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य तथा अकर्मक धातुओं के रूप भी दो वाच्यों में होते हैं- कर्तृवाच्य में और भाववाच्य में ।

कर्तृवाच्यः – कर्तृवाच्य क्रिया का कर्त्ता प्रथमा विभक्ति में होता है और क्रिया का सम्बन्ध कर्ता से होने के कारण क्रिया के पुरुष व वचन कर्ता के अनुसार होते है ।
जैसे – चोरः धनं चोरयति अर्थात् चोर धन चुराता है । यहाँ चोरः प्रथमा विभक्ति एकवचन है अत : चर् धातु का प्रयोग ‘ चोरयति ‘ भी लट् लकार के प्रथम पुरुष एकवचन में हुआ ।

•कर्तृवाच्य का प्रयोग सकर्मक और अकर्मक दोनों प्रकार की क्रियाओं में होता है जैसे बालकः हसति में हस् धातु अकर्मक है ।

•कर्मवाच्यः – कर्मवाच्य क्रिया का कर्त्ता तृतीया विभक्ति में प्रयुक्त होता है – और कर्म प्रथमा विभक्ति में । इसमें क्रिया का विशेष सम्बन्ध कर्म से रहता है अत : क्रिया के पुरुष व वचन कर्म के अनुसार ही होते हैं ।
जैसे – बालकाः गुरूणा पाठ्यन्ते अर्थात् बालक गुरू के द्वारा पढ़ाये जाते हैं । और फलानि बालकैः तत्र नीयन्ते अर्थात् बालकों के द्वारा फल वहाँ पर ले जाये जाते हैं । इन दोनों वाक्यों में बालकाः और फलानि कर्म है – परन्तु क्रिया के साथ कर्ता की अपेक्षा इनका अधिक सीधा सम्बन्ध होने के कारण पठ् और नी धातुओं के रूप कर्म के अनुसार प्रथम पुरुष बहुवचन में आये है ।
कर्मवाच्य में कर्म का होना अनिवार्य है । अत : वाक्य का यह रूप केवल सकर्मक क्रिया से बनता है।

•भाववाच्यः – संस्कृत में अकर्मक क्रियाओं को कर्मवाच्य जैसा रूप देकर वाक्य बनाये जाते है । इस प्रकार के प्रयोग भाववाच्य कहलाते है । जैसे – ‘ तेन गम्यते ‘ रामेण हस्यते ‘ अर्थात् उसके द्वारा गमन किया जाता है । राम के द्वारा हँसा जाता है इत्यादि । भाववाच्य में कर्म नहीं होता है । अत : क्रिया का रूप सदा प्रथम पुरुष और केवल एकवचन में आता है ।

वाच्य परिवर्तन के अतिरिक्त नियम

( क) धातु के साथ ‘ य ‘ लगता है । आत्मने पद ही होता है । साधारणतया धातु में अन्तर नहीं होता । जैसे- भूयते , पठ्यते , लिख्यते , रक्ष्यते ।
( ख ) धातु को गुण नहीं होता । धातु मूलरूप में रहती है । गच्छ , पिव् , जिन , आदि नहीं होते ।
( ग ) अकारान्त धातुओं में से इनके ही आ को ई होता है । जैसे- दा , धा , हा , मा , स्था , पा , गा , सा । अन्य धातुओं को नहीं । जैसे- दीयते , धीयते , मीयते , स्थीयते , गीयते , पीयते , हीयते , सीयते ।
( घ ) हस्व ऋ अन्तवाली धातुओं को ऋ के स्थान पर रि हो जाता है । जैसे कु भ , धू , ह के स्थान पर क्रियते , हियते , ध्रियते , म्रियते ।
( ङ ) दीर्घ ऋ अन्तवाली धातुओं को ईर् होता है , यदि पवर्ग आरम्भ में हो तो ऊर् हो जाता है । गृ- गीर्यते , जृ – जीर्यते , शृ – शीर्यते , तृ- तीर्यते । परन्तु पृ को पूर्यते होता है ।

( च ) वच् आदि धातुओं को सन्प्रसारण होता है ।
वच्- उच्यते , यज्- इज्यते , वप्- उप्यते , स्वप्- सुप्यते , वह् उह्यते , गृह्- गृह्यते , प्रच्छ- पृच्छयते , वस्- उप्यते ।
( छ ) हस्व ई को ई उ को ऊ हो जाता है।जि – जीयते , चि – चीयते , हु- हूयते ।
( ज ) धातु के बीच के न् का प्रायः लोप हो जाता है । जैसे – मन्थ- मथ्यते , बन्ध – बध्यते , भ्रंश- भ्रंश्यते । इनमें न् रहेगा- वन्द्यते , चिन्त्यते , निद्यते ।

उदाहरण

कर्तृवाच्य – कर्तृवाच्य

सोहन : वेद पठति । – सोहनेन वेद : पठ्यते ।
रामः सूर्यं पश्यति । – रामेण सूर्यः दृश्यते।

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