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UPAMAN PRAMAN KA NIROOPAN

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उपमान प्रमाण का निरूपण

‘ उपमितिकरणमुपमानम् ‘ अर्थात् उपमिति के कारण को उपमान कहते हैं । उपमिति का अर्थ है – सादृश्य या समानता ।
जहां पहले से ही कोई अन्य वस्तु हो उसे ‘ उपमान ‘ कहते हैं । जैसे — यदि किसी व्यक्ति ने गाय नहीं देखा है किन्तु उसके लक्षणों से परिचित है , ऐसी अवस्था में यदि अन्यत्र कहीं वैसा ही जानवर दिखायी देने पर उसे गाय ही समझना उपमान है ।

• उपमान के लक्षण

एक दूसरी प्रसिद्ध वस्तु का सादृश्य देकर विभिन्न दूसरी अप्रसिद्ध वस्तु का ज्ञान कराने को ही उपमान कहते हैं , जैसे – दण्ड से दण्डक रोग को , धनुष से धनुस्तम्भ रोग को और बाण चलाने वाले से आरोग्य देने वाले वैद्य को समझना चाहिये।

उपमान के भेद इसके तीन भेद है –

१. साधर्म्य उपमान – इसके अन्तर्गत किसी ज्ञात वस्तु के आधार पर किसी अज्ञात वस्तु का ज्ञान प्राप्त करते हैं ।

जैसे – कोई व्यक्ति गाय को नहीं जानता है किन्तु जब ‘ गौ ‘ को देख लेता है या उसके विषय में ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद अन्य कहीं वैसा ही पशु देखता है तो वह समझ लेता है कि यह गाय ही हैं , इस ज्ञान को ‘ साधर्म्य ‘ या ‘ सादृश्य विशिष्टपिण्डज्ञान उपमान कहते हैं ।

२. वैधर्म्य उपमान – किसी ज्ञात वस्तु की विषमता के आधार पर किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करना या किसी असाधारण लक्षण के आधार पर ज्ञान प्राप्त करते है ।

जैसे यदि किसी व्यक्ति ने हाथी नहीं देखा है किन्तु भैस देखा है , इस आधार पर उसे समझाया जाता है कि दोनों में क्या अन्तर है । अत : इन्हीं असमानताओं के आधार पर जब वह हाथी देखता है तो वह उसे पहचान लेता है । यहां पहचान ज्ञान कारण भैस और हाथी की असमानता है , अत : इसे वैधर्म्य उपमान कहते हैं ।

३. धर्ममात्र उपमान – यहां वस्तु का ज्ञान उसकी विचित्रताओं और विशेषताओं के आधार पर किया जाता है ।

जैसे – ऊंट को नहीं जानने वाला व्यक्ति जब ऊंट के विषय में उसकी विचित्र लम्बी गर्दन , पीठ का ऊंचा होना और शरीर के अधिक ऊंचे होने के लक्षणों को जानता ( ज्ञान करता ) है और बाहर निकलने पर उसे जब ऐसा ही जानवर दिखायी देता है , तब उसे ज्ञात होता है कि ‘ यही ऊंट है ‘ ऐसा ज्ञान ‘ धर्ममात्र उपमान ‘ है ।

आयुर्वेद में उपयोगिता
1 ) सामान्य विशेष में द्रव्य , आहार विहार एवं शरीर के भावों की वृद्धि और हास के उदाहरण में उपमान के साधर्म्य और वैधर्म्य मूल दोनों भेद का स्पष्ट प्रयोग दिखाई पड़ता है ।

2 ) दिनचर्या और स्वास्थ्य रक्षण में – नेत्र में अंजन या आश्च्योतन से दृष्टि स्वच्छ होकर उसी प्रकार निर्मल हो जाती है जिस प्रकार आकाश में चन्द्रमा बादल हटने से ।

3 ) व्यायाम में – अत्यधिक व्यायाम करने से मनुष्य उसी प्रकार मृत्यु को प्राप्त होता है जैसे हाथी को खीचने से सिंह की मृत्यु हो जाती है ।

4 ) शस्त्र कर्म में उपमा लेखन , छेदन , वेधन , भेदन – मसूर , अर्धमसूर , अर्धकेश तथा केश के समान ।

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