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TASYASHITIYA ADHYAY

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तस्याशितीय अध्याय

आहार के प्रकार हर चार प्रकार के होते हैं ( 4 ) – अशित , पीत , लीढ , खादित ।

  • संवत्सर ( वर्ष ) में छः ऋतु तथा दो अयन होते हैं । 1 ) आग्नेय काल / आदान काल / उत्तरायण काल :- सूर्यबल प्रबल , प्राणिबल मे ह्रास , वायु में रूक्षता होती है।
    इसके अंतर्गत 3 ऋतु है- शिशिर , बसंत , ग्रीष्म ( 2 ) सौम्य काल / विसर्गकाल / दक्षिणायन कालः- चन्द्रबल प्रबल , प्राणिबल मे वृद्धि एंव वायु में स्निग्धता होती है। इसके अंतर्गत भी 3 ऋतु आती हैं -वर्षा , शरद , हेमंत
  1. हेमन्त ऋतु
  2. जठराग्नि एवं शरीर बल – उत्तम् ( श्रेष्ठ ) ।
  3. औदक , आनूपमास , अतिमेदस्यी पशु – पक्षियों का मांस विलेशय एव प्रसह जाति के पशु – पक्षियों का मांस ।
  4. मदिरा सीधु तथा मधु अनुपान के रूप में लेना चाहिए और जल का सेवन करना चाहिए ।
  5. तैलाभ्यंग , उत्सादन , मूर्धा तैल ,जिन्ताक स्वेद , उष्ण भूगृह तथा उष्ण गर्भगृह में निवास करना चाहिए ।
  6. अपथ्य – वातल एव लघु आहार – विहार प्रवात प्रमिताहार और सत्तू (उदमन्थ )
  7. शिशिर ऋतु
  8. हेमन्त और शिशिर ये दो ऋतुचर्याए प्रायः समान होती है ।
  9. शिशिर ऋतु में शीतलता अधिक बढ़ जाती है ।
  10. अपथ्य – कटु, तिक्त, कषाय रस वाले, वातल एंव लघु आहार – विहार का सेवन करें । 3.बंसत ऋतु
    1.कफ का प्रकोप – वमन कर्म और मधु का सेवन।
  11. शारभ , शाशक , ऐण ,लावा , बटेर और ( कपिंजलम ) सफेद तीतर का मांस- सेवनीया
  12. व्यायाम , उर्द्धतन , धूम्र ,कवलग्रह तथा अंजन का प्रयोग करना चाहिए।
    4 साध्य – माध्वीक मंदिरा का पान एव मर्यादित मैथुन करना चाहिए ।
  13. अपथ्य – गुरू , स्निग्ध मधुर अम्ल पदार्थ एवं दिवास्वन का निषेध हैं।

4 .ग्रीष्म ऋतु

  1. मधुर शीतल , स्निग्ध , आहार विहार तथा दूध , घी , शालिचावल का सेवन । लेकिन व्यायाम और मैथुन का निषेध ।
    2.जांगम प्राणी मांस एवं शीतं सर्शकर मन्थ ( शर्करा युक्त शीतल सत्तू ) का सेवून ।
  2. अपथ्य – कटु , अम्ल , लवण , उष्ण , विदाही पित्तवर्धक आहार ।

5.वर्षा ऋतु
1.सर्व दोष प्रकोपक ऋतु कहलाती है । वर्षा ऋतु में त्रिदोषघ्न एवं अग्निदीपक ( संस्कारित ) अन्न पान करें ।
2.उद्वर्तन और स्नान करके गन्ध गाला आदि धारण करना चाहिए ।

  1. अपथ्य – उदमन्थ, दिवास्वप्न, अश्याम , नदीजलम् , आतप , व्यायाम , और व्यवाय ( मैथुन ) वर्जित है ।
  2. सेवनीय – मधु मिला हुआ माध्यीक अरिष्ट , माहेन्द्र जल , कौप , सारस , का श्रृत शीतजल ।
  3. शरद ऋतु
  4. पित्त प्रकोपक – पित्त शामक आहार – विहार एवं विरेचन कर्म , रक्तमोक्षण ।
  5. लावा ( बटेर ) , कपिन्ज़लान ( गौरया ) , एण , दुम्बा भेड़ सांभर और शशक मांस का सेवन , मर्यादित मैथुन , करें ।
  6. अपथ्य – वसा , तो, क्षार, दही और आनूप प्राणियों का मास, अवश्याय , प्राग्वात , दिवास्वप्न , आतपसेवुन ।
  7. हंसोदक – स्नान , पान , अवगाहन हेतु ‘हंसोदक जल’ का प्रयोग ।
  8. प्रावृट् -ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु के मध्य ।
  9. श्रेष्ठमाह – माघशीर्ष
  10. प्रदोष – रात्रि का आरम्भिक काल
  11. ऋतुसंधि -वाग्भट्ट ( कुल 14 दिन – गतऋतु का अंतिम सप्ताह + नव ऋतु का प्रथम सप्ताह )
  12. यमंदष्ट्रा – कार्तिक माह के अंतिम 8 दिन +अगहन माह के प्रारम्भ के 8 दिन यमंदष्ट्रा कहलाते है ।

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