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TAPRAN PUTPAK VIDHI

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तर्पण पुटपाक विधि

• तर्पण के विषय-

नेत्रों के असमर्थ ( ताम्यति – अन्धकारमय दिखायी देना ) होने , स्तब्धता , शुष्कता ( Dryness ) रुक्षता , अभिघात होने , वातपित्तज प्रकोप , कठोरता , पक्ष्म ( Eye – lashes ) के गिरने , देखने में कठिनता ( नेत्रों से पानी आने ) , नेत्र का कठिनता से खुलना ( कृच्छ्रोन्मिल ) , शिराहर्ष , शिरोत्पात , नेत्र के सामने अंधेरा होना , अर्जुन , अभिष्यन्द ( Conjunctivitis ) , अधिमन्थ , अन्यतोवात , वातपर्याय और शुक्र रोग में तर्पण करना चाहिये ।

जब रोगी के नेत्र में लालिमा , अश्रु , वेदना और नेत्र का मैल शान्त हो जाये तो शोधन ( वमन – विरेचनादि से ) किये हुये और नस्य से शरीर तथा शिर का शोधन करके रोगी को वायु रहित ( निवाते ) स्थान में उत्तान ( चित्त ) लिटाकर साधारण ऋतु में प्रात : या सार्यकाल तर्पण देना चाहिये ।

• तर्पण की विधि-

रोगी के ( उत्तान लेटे हुये ) नेत्र कोशों के बाहर जौ ( Barley ) और उड़द ( माष Eng : – Horse – Been , L.N.- Phaseolus radiatus Linn . ) के आटे से एक समान दो अंगुल ऊंची मजबूत पाली ( घेरा Circle ) बना देते हैं । इसमें तप्त जल में रखकर पिघलाया गया घृत ( दोषानुसार निर्मित ) भर देते हैं और रोगी को नेत्र खोलने बन्द करने को कहते हैं ।

नक्तान्ध्य ( रतौंधी Night blindness ) , वातज तिमिर रोग ( दिखायी न देना ) और कठिनायी से नेत्र खुलने आदि में घृत के स्थान पर वसा ( Fat ) का प्रयोग करते हैं , इसे पाली ( Circle ) में पक्ष्म ( Ashes ) को डूबने तक भरना चाहिये ।

• औषध धारण का समय-

इसके ( घृत या वसा भरने के ) पश्चात् रोगी नेत्र को धीरे – धीरे खोले । नेत्र के खोलने की इस मात्रा ( समय ) को गिनते हैं , जैसे- वर्त्मज ( Eye lids ) रोगों में एक से सौ की गिनती तक , सन्धिगत रोगों में तीन सौ गिनती तक , सित ( शुक्लज- Schlera ) रोगों में पांच सौ ( ५०० ) गिनती तक , असित ( कृष्ण भाग Cornea ) रोगों में सात सौ ( ७०० ) गिनती तक , दृष्टिगत रोगों में आठ सौ ( ८०० ) गिनती तक , अधिमन्थ और वातगत रोगों में एक हजार ( १००० ) मात्रा गिनने तक , पित्तज रोगों में छ : सौ ( ६०० ) , स्वस्थ में भी छ : सौ मात्रा गिनने तक और कफज ( बलासे ) नेत्र रोगों में पांच सौ ( ५०० ) मात्रा गिनने – तक इसे ( घृत या वसा को ) धारण करना चाहिये ।

• तर्पण के पश्चात्-

इसके ( तर्पण के ) बाद अपाङ्ग प्रदेश ( कान की तरफ का नेत्र कोण ) में ( पाली- Circle ) छेद करके स्नेह ( घृत या वसा ) को दूसरे पात्र में निकाल लेते हैं और धूम पिलाते हैं इस समय आकाश ( व्योम ) और चमकीले ( भास्वरं ) रूपों को नहीं देखना चाहिये ।

• पुटपाक विधि-

स्नेहपान करने के पश्चात् जैसे शरीर शिथिल ( क्लान्त ) हो जाता है उसी प्रकार तर्पण के पश्चात् दृष्टि शिथिल हो जाती है । इसलिये तर्पण के पश्चात् दृष्टि में बल बढ़ाने के लिये पुटपाक का प्रयोग करना चाहिये । पुटपाक का प्रयोग तर्पण करने वाले रोगों में ही करना चाहिये ।

• पुटपाक निर्माण विधि-

मांस और औषध के कल्क ( Paste ) की १-१ पल , बिल्व ( ४ तोला -46 gm . ) की अलग अलग मात्रा पिण्ड रूप में लेकर इसे स्नेहन पुटपाक के लिये एरण्ड ( उरुबुक Eng.- Castor oil tree , L.N. – Ricinus communis Linn . ) , लेखन पुटपाक के लिये वट ( बरगद , Eng : – Banyan , L.N.- Ficus bengalensis Linn . ) और प्रसादन पुटपाक के लिये कमल ( अम्भ Eng.- Lotus . L.N.- Nelumbo nucifera gaerin ) के पत्तों में लपेटते हैं , इसके बाद इसके उपर मिट्टी ( काली ) का लेप ( दो अंगुल मोटा ) करते हैं ।

इसके बाद पुटपाक को धव ( Eng : – Axle – wood , L.N. Anogeissus latifolia Wall ) , धन्वन ( L.N.- Grewia latifolia Vanl . ) की लकड़ी और गोमय ( गोबर ) में पकाते हैं ।

जब पिण्ड अच्छी तरह से लाल हो जाये तब इसे निकाल कर निचोड़ लेते हैं और इसका रस तर्पण जैसे प्रयोग में लाते है ।

• पुटपाक धारण करने का काल-

लेखन पुटपाक एक सौ मात्रा तक , स्नेहन पुटपाक दो सौ मात्रा तक और प्रसादन पुटपाक तीन सौ मात्रा गिनती तक धारण करना चाहिये ।

• नेत्र की रक्षा का महत्व-

नस्य , अञ्जन , तर्पण आदि सभी प्रकार से नेत्र बल की रक्षा का प्रयत्न करना चाहिये । क्योंकि दृष्टि के नष्ट हो जाने से सम्पूर्ण संसार अंधकारमय एक जैसा हो जाता है ।

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