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TANTRA GUN

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तन्त्र गुण

शास्त्र का ही पर्यायवाची शब्द तन्त्र है ।

” त्रायते शरीरमनेनेति तन्त्रं शास्त्रं चिकित्सा च ” ।।

इससे शरीर की रक्षा होती है , इसलिए यह तन्त्र है । इसे शास्त्र तथा चिकित्सा भी कहते हैं । तन्त्र के गुण और दोषों को भी तन्त्रयुक्ति का एक आवश्यक अंग माना गया है।

जहां आचार्य चरक ने तंत्र के दोषों का वर्णन किया है , वहीं विमान स्थान में तंत्र के १८ गुणों का भी वर्णन किया है –

१. सुमहद्यशस्विधीरपुरुषसेवित – यशस्वी और धैर्यवान पुरूषों द्वारा प्रशंसित तथा मान्यता प्राप्त हो ।

२. अर्थबहुल – अर्थ की अधिकता अर्थात् स्पष्ट हो ।

३. आप्तजनपूजित – आप्त पुरुषों द्वारा पूजित हो ।

४. त्रिविघशिष्यबुद्धिहित – तीनों प्रकार के शिष्यों ( उत्तम , मध्यम और अल्प बुद्धि वाले ) के लिये लाभप्रद हो ।

५. अपगतपुनरूक्तदोष – पुनरूक्त ( एक ही बात को बार – बार कहना ) दोष से रहित हो ।

६. आर्ष – ऋषियों ने बनाया हो ।

७. सुप्रणीतसूत्रभाष्यसंग्रहक्रम – सम्यक् रूप से लिखा गया , सूत्र – भाष्य और संग्रह के क्रम में हो ।

८. सु -आधार – सुन्दर अर्थ वाला हो ।

९ . अनवपतितशब्द – अशिष्ट और अश्लील शब्दों से रहित हो ।

१०. अकष्टशब्द – जिसके उच्चारण में कष्ट न हो ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया हो ।

११. पुष्कलाभिधान – पर्यायवाची ( Synonyms ) शब्दों का बहुतायत से प्रयोग किया गया हो ।

१२. क्रमागतार्थ – परम्परा से प्रयुक्त अर्थ को स्वीकार किया गया हो ।

१३. अर्थतत्त्वविनिश्चयप्रधान – विषय के तत्त्व तक पहुंचना प्रधान उद्देश्य हो ।

१४. सङ्गतार्थ – पूर्व ( पहले के ) और पर ( पश्चात् ) के वाक्यों में विरूद्धता न पायी जाती हो , ऐसे प्रकरण के अनुरूप विषय वाला हो ।

१५. असंकुलप्रकरण – जिसमें एक प्रकरण का विषय दूसरे में और दूसरे का अन्य कहीं न कहा गया हो ।

१६. आशुप्रबोधक – अर्थ को शीघ्र बताने में समर्थ हो ।

१७. लक्षणवत् – पदों के लक्षणों ( परिभाषाओं ) को स्पष्ट करने वाला हो ।

१८. उदाहरणवत् – जिसमें पदों ( विषयों ) को उदाहरण से स्पष्ट किया गया हो ।

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