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TANTRA DOSH

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तन्त्र दोष

तन्त्र का अर्थ यहाँ शास्त्र है । किसी भी विषय पर लिखा गया ग्रन्थ शास्त्र या तन्त्र तभी सर्वसम्मति से मान्य होता है जब उसमें दोष नहीं हों।

अष्टांग हृदय उत्तर तंत्र ( सर्वांगसुन्दरी ) के व्याख्याकार अरूणदत्त ने 15 दोष बताये हैं – .
१. अप्रसिद्ध ,
२. दुष्प्रणीत ,
३. असंगतार्थ ,
४. असुखारोहि ,
५. विरूद्ध ,
६ . अतिविस्तृत ,
७. अतिसंक्षिप्त ,
८. अप्रयोजन ,
९ . भिन्नक्रम ,
१०. सन्दिग्ध ,
११ . पुनरूक्त ,
१२. निष्प्रमाणक ,
१३. असमाप्ताक्षर ,
१४. अपार्थक और
१५. व्याहत् ।

• तंत्रयुक्ति में 14 तंत्र दोषों का वर्णन है।

१. अप्रसिद्ध शब्द – जो शब्द समाज में प्रचलित न हो उनका प्रयोग करना
२. दुष्प्रणीत शब्द – एसा शास्त्र ( तंत्र ) जिसम सूत्र , भाष्य और संग्रह का क्रम व्यवस्थित न हो ।
३. असंगतार्थ शब्द – यह शब्द मूल सूत्र से सम्बन्धित नहीं होता है ।
४. असुखारोही शब्द – ये शब्द उच्चारण में कठिन ( सुख से उच्चारित नहीं ) होते हैं।
५. विरुद्ध शब्द – इसमें दृष्टांत , सिद्धान्त और समय का कहीं भी सामंजस्य नहीं होता है ।
६. अतिविस्तृत – किसी भी विषय का अतिविस्तार से वर्णन करना ।
७. अति संक्षिप्त – किसी विषय का अति संक्षेप में वर्णन करना जैसे — मात्र ‘ त्रिसूत्र ‘ कह देना ।
८. अप्रयोजन शब्द – यह प्रयोजन रहित होता है जैसे — सद्बत का वर्णन करना किन्तु इसके प्रयोजन ( उद्देश्य ) का वर्णन न करना ।
९ . सन्दिग्ध शब्द – किसी विषय का सन्देहपूर्ण वर्णन करना , जैसे — अकाल मृत्यु होती है या नहीं ।
१०. पुनरुक्त शब्द – एक ही विषय को बार – बार कहना ।
११. निष्प्रमाण शब्द – ऐसे विषय का वर्णन जिसका प्रमाण न हो । समाप्त कर देना ।
१२. असमाप्तार्थ शब्द – किसी विषय का पूर्ण रूप से वर्णन न कर बीच में ही समाप्त कर देना ।
१३. व्याहत शब्द – किसी सिद्धान्त का वर्णन करने के बाद उसके विरुद्ध कोई वर्णन करना जैसे — प्रमेह रोगी को पहले तो आस्थापन वस्ति का निषेध करना और बाद में आस्थापन वस्ति का निर्देश देना ।
१४. अपार्थक शब्द – ऐसे शब्दों का प्रयोग जिनका कोई अर्थ न हो ।

अरूणदत्त ने इन १४ तंत्रदोषों के अतिरिक्त १५ वां तंत्रदोष भित्रक्रम माना है-

१५. भिन्नक्रम शब्द – इसमें विषयसूची या अनुक्रमणिका में विषय क्रम कुछ हो और ग्रन्थ में अन्दर का क्रम कुछ और हो । अतः ग्रन्थ की रचना करते समय अपने ग्रन्थ को इन दोषों से मक्त रखना चाहिये ।

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