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SVEDAVIDHI

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स्वेदविधि

• स्वेद के प्रकार

स्वेद ( अग्नि स्वेद- Fomentation ) चार प्रकार का होता है- ( १ ) तापस्वेद , ( २ ) उपनाह स्वेद , ( ३ ) उष्मस्वेद और ( ४ ) द्रव स्वेद ।

•  ताप स्वेद का लक्षण-

यह अग्नि से गरम किये गये वस्त्र ( वसन ) , फाल – लोहे का और हाथ की हथेली आदि से किया जाता है ।

• उपनाह स्वेद-

यह वचा ( Eng- Sweet Flag . L.N. – Acorus calamus Linn ) , किण्व ( मद्यसन्धान- Fermentation में बचा तलछट ) , शताहा ( सौंफ Eng- Dill , L.N.- Anethum sowa Kurz ) , देवदारू ( Eng – Deodar , L.N.- Cedrus deodara ( Roxb ) Loud ) , धान्य ( जौ – गेहूँ आदि ) , सम्पूर्ण सुगन्ध कारक द्रव्य ( अगुरू , तगर आदि ) , रास्ना ( L.N.- Pluchea lanceolata C.B. Clarke ) , एरण्ड ( L.N.- Ricinus communis Linn ) और मांस ( आमिष ) में अत्यधिक मात्रा में लवण मिलाकर , स्नेह ( घृत – तैलादि ) , चुक्र ( अम्ल ) , तक्र ( मट्ठा ) और दुग्ध मिलाकर इससे वातज ( शुद्ध ) रोगों में उपनाह स्वेदन करते है ।

कफ युक्त वातज रोग में सुरसादिगण ( अ.ह .१५ / ३०-३१ ) के द्रव्य इनमें मिलाकर स्वेदन करते हैं और पित्त युक्त वातज रोग में पद्माकादि गण के द्रव्य इन द्रव्यों में मिलाकर स्वेदन करते हैं इसका नाम साल्वण स्वेद है , इसे बार – बार करना चाहिये ।

• बन्धन के लिये चर्मपट्टादि –

 स्निग्ध , उष्णवीर्य , मृदु और दुर्गन्धरहित ( अयूति ) चमड़े की पट्टियों से उपनाह द्रव्यों को ( स्वेदन के स्थान पर ) बांधते हैं । इसके न मिलने पर ( अलामे ) वातनाशक पत्ते ( एरण्डादि ) , कौशेय ( रेशम ) , आविक ( भेड़ के बाल से निर्मित कम्बल ) या रूई से बांधते है । रात्रि में बांधे गये उपनाह द्रव्य को दिन में बांधे उपनाह द्रव्य को रात्रि में खोल देना चाहिये ।

•  उष्मस्वेद-

उत्कारिका ( रोटी ) , लोष्टक ( मिट्टी का ढेला ) , कपाल मिट्टी का टुकड़ा , उपल ( पत्थर ) , पांशु ( धूल ) , पत्रमगेन ( एरण्ड आदि वातनाशक पत्तों के टुकड़े ) , धान्य ( गेहूँ आदि ) , करोष ( सूखा गोबर ) , सिकता ( बालू ) और तुष ( भूसी ) को अनेक प्रकार से गरम करके देश और काल के अनुसार स्वेदन करना चाहिये ।

अ.सं.सू. २६/७ में उष्म स्वेद ८ प्रकार के बताये गये हैं- ( १ ) पिण्ड , ( २ ) संस्तर ( ३ ) नाडी ( ४ ) घनाश्म ( ५ ) कुम्भी ( ६ ) कूप ( ७ ) कुटी और ( ८ ) जेन्ताक स्वेद । यहाँ इनका विस्तृत वर्ण किया गया है ।

• द्रवस्वेद-

इसमें शिग्रु ( सहजन Eng- Horse radish Tree , L.N.- Moringa oleifera Lam ) , वारणक ( Eng- Three leaved Caper , L.N.- Crataeva nurvala Buch – Ham ) , एरण्ड ( L.N.- Ricinus communis Linn ) , करञ्ज ( Eng Indian beech , L.N.- Pongamia pinnata Pierre ) , सुरसा ( तुलसी Eng- Holy Basil , L.N.- Ocimum canum Sims ) , अर्जक ( बनतुलसी – बर्बरी Eng- Sweet Basil , L.N. – Ocimum bacilicum Linn ) , शिरीष ( L.N. Allbizzia leheck Benth ) , वासा ( Eng- Malabar Nut . L.N.- Adhatoda vasica Nees ) , वंश ( बांस Eng- Thorny Bamboo , L.N … Bambusa arundinacea Willa ) अर्क ( मदार Eng- Muddar , L.N.- Calotropis gigantea ) , मालती ( चमेली Eng Common Jasmine , L.N.- Jasminum officinale Linn ) , दीर्घवृन्त ( श्योनक ) और इनके पत्तों के टुकड़े , वचादि गण ( अ.ह.सू .१५ / ३५ ) के द्रव्य , आनूप मांस , वारिज मांस और दशमूल को अलग – अलग या मिलाकर दोषों के अनुसार स्नेहों के साथ खुश , शुक्त ( सिरका ) , जल ( वारि ) और दुग्ध आदि से पकाकर इनसे घड़िया ( छोटा घड़ा – कुम्भी ) या जिससे वाष्प निकल सके ऐसे नलिका ( नाड़ी ) वाले पात्र में भरकर शरीर के रोगी स्थान को स्निग्ध कर कपड़े से ढंक ( वाससा आच्छादित ) कर सुख से ( सहने योग्य ) सेचन ( Irrigate ) द्वारा सिकाई ( Fomentation ) करते है

•  अवगाह स्वेद-

सम्पूर्ण अंगों में वायु का प्रकोप होने पर या अर्श ( Piles ) आदि कृच्छ्र ( कष्ट ) साध्य रोगों में इन्हीं ( शिग्रु आदि ) से बने स्वेदन द्रव्यों से कुण्ड ( Tub ) को भरकर उसमें रोगी को बैठाते हैं।

•  स्वेद विधि-

रोगी के शरीर में स्नेह पान से अन्त : और बाहा स्नेहन अभ्यङ्ग ( Massage ) करने के बाद रात्रि में सेवन किये गये आहार के जीर्ण ( पाचन ) हो जाने पर वायु रहित ( निबाते ) स्थान में स्वेदन करना चाहिये ।

• सम्यक् स्वेदन के लक्षण-

स्वेदन होने के बाद जब शीत और शूल ( वेदना ) का नाश हो जाये और शरीर के अंग कोमल ( मार्दव ) हो जायें तो सम्यक् स्वेदन होता है , इसके बाद शरीर का धीरे – धीरे मर्दन कर सुखोष्ण जल से स्नान करे और स्नेह पान में वर्णित विधि का सेवन करें । स्वेदन का अतियोग होने पर पित्त का और रक्त का कोप , तृष्णा , मूर्छा ( बेहोशी ) , स्वरभेद , अङ्गसाद ( शिथिलता Dulness ) , भ्रम ( चक्कर आना Dizziness ) , सन्धियों में पीड़ा होना ( Pain In Join ) , ज्वर ( Fever ) , काले और लाल धब्बों ( मण्डल Rashes ) का दिखायी देना और वमन ( छर्दि Emesis ) के लक्षण उत्पन्न होते हैं । इसकी चिकित्सा के लिये स्तम्भन औषध देते हैं ।

विष , क्षार , अग्नि , अतिसार ( Diarrhoea ) , छर्दि ( Vomiting ) और मोह ( मूर्छा Unconsciousness ) के रोगियों को भी स्तम्भन औषधियाँ देना चाहिये ।

• स्वेदन के अयोग्य-

अतिस्थूल , अतिरूक्ष , अतिदुर्बल , मूर्छित ( बेहोश Unconscious ) , जिनका स्तम्भनं करना हो स्तम्भनीय ) , क्षतक्षीण , कृश ( क्षाम ) , महारोगी , तिमिर , उदर , विसर्प कुष्ठ , शोथ , आदय रोगी ( वातरक्त का Gout रोगी ) , दुग्ध , दही , स्नेह और मधु का पान किया हुआ , जिसका विरेचन कराया गया है , गद अंश ( Anal Prolapse ) , गुद . दुग्ध का रोगी ग्लानि ( Depression ) , क्रोध शोक , भय से पीड़ित , भूख , प्यास , कामला , ( Jaundice ) , पाण्डु ( Anaemia ) , प्रमेह और पित्त से पीडित , गर्भिणी , तुमती ( पुष्पिता ) और प्रसूता इन सबका स्वेदन नहीं करना चाहिये । आल्यायिक ( अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर ) अवस्था मृदु स्वेदन करना चाहिये

• स्वेदन के योग्य-

वास ( Dyspnoca ) , कास ( Conghing ) , प्रतिश्याय ( जुकाम Rhinitish ) , हिक्का ( Hiccough ) , आध्मान ( वायु के कारण पेट फूलना ) , विबन्ध ( मलावरोध Constipation ) , स्वरमेद , वातव्याधि , कफज रोग , आम रोग , जड़ता ( Stifness ) . गुरूता अङ्गमर्द ( Bodyache ) , कटी – पार्छ , पृष्ठ , कुक्षि और हनु का जकड़ जाना , मुष्क वृद्धि ( अण्ड वृद्धि ) , खल्ली ( हस्तपाद में ऐठन ) , आयाम ( बहिरायाम – हनुस्तम्भ और अन्तरायाम – मन्यास्तम्भ ) , और वातकण्टक , कृच्छ ( Dysurea ) , अर्बुद ( Tomour ) अन्थि , शुक्राचात ( शुक्राश्मरी ) , आळयमारूत ( उरूस्तम्भ ) । स्वेदन के बाद दोष और रोग का विचार कर पव्य ( आहार ) का सेवन करना चाहिये । सर्वाग स्वेदन ( जेन्ताक आदि से ) वाले दिन अर्थात जिस दिन सर्वाग स्वेदन लिया हो उस दिन या जब तक बल की प्राप्ति न हो व्यायाम का त्याग करना चाहिये ।

• अनग्नि स्वेद-

 मेद या कफ से वायु के आवृत्त ( धिरे ) होने पर अनाग्नि ( जिसमें अग्नि का संयोग न हो ) स्वेद करना चाहिये । इस स्वेदन के लिये वायु रहित ( निर्वात ) घर ( सदन ) , परिश्रम आयास ओढ़ने ( प्रावरण ) के लिये गुरू ( भारी ) वस्त्र भय उत्पन्न करना , उपनाह ( शरीर को गरम कपड़े की पट्टी से बांधना ) और आदि बाहु से करने वाले युद्ध ( नियुद्ध ) , क्रोध करना , अति महापान , भूख ( उपवास ) और धूप सेवन ( आतप ) उपाय है।

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