fbpx

SVARAS KALPANA

by

स्वरस कल्पना

 परिभाषा

“आहृतात्तत्क्षणाकृष्टाद् द्रव्यात्क्षुण्णात् समुद्धरेत् ।

वस्त्रनिष्पीडितो यःस रसः स्वरस उच्यते” ।। ( शा . स . म . ख . 1/2 )

अर्थात् तुरन्त उखाड़ कर लाई हुई औषधि को कूटकर कपड़े से निष्पीडन ( दबाकर ) कर निचोड़ने से जो रस निकलता है , उसको स्वरस कहते हैं ।

स्वरस की मात्राः –

स्वरस गुरु एवं बलवान होने से पल ( 24 ग्राम ) की मात्रा में प्रयोग करना चाहिए । शुष्क द्रव्यों से निष्कासित रस एवं अग्निसिद्धरस ( क्वाथ एवं पुटपाक विधि से निर्मित रस ) एक पल ( 48 ग्राम ) की मात्रा में प्रयोग करना चाहिए ।

“स्वरसस्य गुरुत्वाच्च पलमधू प्रयोजयेत् ।

निशोषितं चाग्निसिद्धं पलमात्रं रसं पिबेत् ।।” ( शा . सं . म . ख . 1/5 )

यह मात्रा , पल ( 24 ग्राम ) मृदुवीर्य द्रव्यों की है , मध्यवीर्य द्रव्यों के स्वरस की मात्रा एक कर्ष ( 12 ग्राम ) और तीक्ष्णवीर्य द्रव्यों का स्वरस ( 6 ग्राम ) कर्ष की मात्रा में प्रयोग करना चाहिए ।

स्वरस में प्रक्षेप द्रव्यों का मान –

स्वरस के स्वाद में परिवर्तन करने के लिए अर्थात् स्वादिष्ट बनाने , स्वरस को अधिक प्रभावकारी बनाने एवं शीघ्र कार्यकारी बनाने के लिए प्रक्षेप द्रव्य मिलाये जाते हैं ।

स्वरस में मधु , शर्करा , गुड , क्षार , जीरक , लवण , घृत , तैल एवं चूर्ण आदि डालने हो तो एक कोल ( 6 ग्राम ) की मात्रा में मिलाना चाहिए ।

पुटपाक विधि से निर्मित स्वरस में मधु एक कर्ष मिलाना चाहिए ।

आर्द्रकस्वरस :

“आईकस्वरसः क्षौद्रयुक्तो वृषणवातनुत् ।

श्वासकासरुचीर्हन्ति प्रतिश्यायं व्यपोहति ।।” ( शा . सं . म . ख . 1/13 )

अर्थात् आर्द्रक का स्वरस मधु ( शहद ) मिलाकर पीने से वृषणगत वात , श्वास , कास , अरुचि और प्रतिश्याय को नष्ट करता है ।

तुलसी स्वरस :

“पीतो मरिचचूर्णेन तुलसीपत्रजो रसः ।

द्रोणपुष्पीरसो वापि निहन्ति विषमज्वरान् ।।” ( शा . सं . म . ख . 1/10 )

अर्थात् तुलसीपत्र का स्वरस या द्रोणपुष्पी का स्वरस मरिच चूर्ण मिलाकर पीने से विषमज्वरों को नष्ट करता है ।

कुमारी स्वरस :

घटक द्रव्य : 1. घृतकुमारी पत्र -100 ग्राम

निर्माण विधिः –

सर्वप्रथम घृतकुमारी पत्र के दोनों तरफ लगे दन्तुर चाकू से हटाते हैं , फिर हरिताभ बाह्य आवरण हटाकर , उसके भीतर स्थित घृत के समान पिच्छिल मज्जा को काँच पात्र में उसी रूप में रखते हैं या महीन वस्त्र छानकर रखते हैं ।

मात्रा : आभ्यन्तर प्रयोग -10 से 20 मिली .

बाह्य प्रयोग – यथावश्यक

उपयोग : – 1. इसके स्वरस का अग्निमांद्य , उदररोग , गुल्म , प्लीहा – यकृत वृद्धि , उदरशूल , विबन्ध तथा कृमिरोग में प्रयोग करते हैं ।

2. अग्निदग्ध में इसका बाह्यप्रयोग हरिद्रा के साथ करते हैं ।

3. अनेक रसद्रव्यों के भस्म निर्माण में इसके स्वरस की भावना दी जाती है । जैसे- शंख , शुक्ति , वराटिका आदि ।

4. इसके स्वरस से कुमार्यासव का निर्माण किया जाता है ।

वासा पुटपाक स्वरस :

“पिष्टानां वृषपत्राणां पुटपाकरसो हिमः ।

मधुयुक्तो जयेद् रक्तपित्तकासज्वरक्षयान् ।।” ( शा . सं . म . ख .1 .1 / 38 )

अर्थात् पुटपाकविधि से निर्मित वासापत्र स्वरस मधु मिलाकर पीने से रक्तपित्त , कास , ज्वर और क्षय को जीतता है ।

Leave a Comment

error: Content is protected !!