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SVABHAVOPARAMAVAD

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स्वभावोपरमवाद

‘ स्वभावोपरम ‘ का तात्पर्य है – ‘ स्वभावत : उपरम ‘ अर्थात् स्वभावत : नष्ट ( उपरम होना ।

कोई भी वस्तु जो उत्पन्न होती है वह स्वभावत : धीरे – धीरे नष्ट हो जाती है । यह ( नष्ट होना ) प्रकृति का स्वभाव है , किन्तु यह नष्ट होने या क्षय की क्रिया सम्यक् आहार विहार के सेवन से इतने धीरे गति से होती है कि पता नहीं लगता।

विकार को तो चिकित्सा द्वारा दूर कर देते हैं , किन्तु स्वभावतः धातुओं के नष्ट ( स्वभाव + उपरम ) होने की क्रिया को नहीं रोका जा सकता है क्योंकि इसका कारण अज्ञात है यही ‘ स्वभावोपरमवाद ‘ है ।

स्वभाववाद

सृष्टि की रचना मे स्वभाववादी स्वभाव को मुख्य मानते हैं ।

जैसे मूंग दाल तथा तीतर बटेर का मांस स्वभाव से लघु और माष , वाराह तथा महिष मांस स्वभाव से गुरू होते हैं । स्वभाव को सृष्टि का कारण मानने वाले कहते हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति स्वाभाविक रूप से हुई । उनके मत से कांटे में तीक्ष्णता , मृग एवं अन्य पशु पक्षियों में अनेक प्रकार के रंग स्वभाव से ही हो जाते हैं ।

ईख ( गन्ना ) में मीठापन और मिर्च में कटुता स्वभाव से ही आते हैं ।
वस्तुओं मे पाया जाने वाला सहज धर्म ही स्वभाव है ।

• पीलूपाक व पिठरपाक( chemical change and physical change)

‘ पीलूपाक ‘ का तात्पर्य ‘ परमाणु पाक ‘ से है । इस सिद्धान्त के अनुसार जब पाक ( अग्रि संयोग ) की क्रिया होती है तब द्रव्य में अनेक परिवर्तन होते हैं –

१. विघटन ( Destruction or Dissolution ) की अवस्था –
द्रव्य का अग्नि से संयोग होने के बाद सर्वप्रथम परमाणु ( Atom ) सक्रिय हो जाते हैं और इधर – उधर गति करने लगते हैं । इसी गत्यात्मकता के कारण इनमें विघटन ( Destruction ) की क्रिया होने लगती है , जबकि पहले ये एक दूसरे से संयुक्त रहते हैं । जब परमाणुओं ( Atoms ) की संयुक्तावस्था विघटित हो जाती है तो द्रव्य का भी नाश हो जाता है ।
इस अवस्था में जब विघटित होकर सभी स्वतंत्र ( Free ) हो जाते हैं और उनका संयोग अग्नि से होता है , तब प्रत्येक परमाणुओं में परिवर्तन होने लगता है ।

२. पुनः संयोगावस्था – जब स्वतंत्र परमाणुओं की पाक क्रिया पूर्ण हो जाती है और इनका स्पर्श , रूप , रस और गन्ध पूर्णरूपेण परिवर्तित हो चुकते हैं , तब उनके सजातीय ( Belonging to the same class ) परमाणुओं में पुन : संयोग की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है । इस क्रिया को देखा नहीं जा सकता है ।

•पिठरपाक –

यह सिद्धान्त नैय्यायिकों द्वारा प्रतिपादित है । नैय्यायिक पीलू पाक को नहीं मानता है । इनके अनुसार अग्रि के संयोग से उस सम्पूर्ण द्रव्य में पाक ( जिसका पाक होना है ) की क्रिया अन्दर – बाहर समस्त अवयवों में पिण्डरूप में एक साथ होती है ।
पृथ्वी में स्थित समस्त गुणों – स्पर्श , रूप , रस और गन्ध इन चारों में एक साथ पिण्ड के रूप ( Solid form ) में पाक होता है ।
पीलूपाक की उक्त दोनों अवस्थायें विघटन ( Destruction ) और पुन : संयोग की क्रियायें इस पिठरपाक ( पिण्डपाक ) में नहीं होती है । चरक संहिता में जाठराग्नि का आहार के साथ संयोग ‘ स्थूल पाक ‘ ( पिठर पाक ) है जो प्रसाद भाग और किट्ट भाग में परिवर्तित होता है ।
इसके बाद रस , रक्तादिक धात्वाग्रियों द्वारा पाक से परिवर्तन होना ही पीलूपाक है ।

•अनेकान्तवाद

‘ अनेकान्तवाद ‘ का तत्पर्य है अनेक मतों का होना । यदि किसी एक ही विषय पर विभिन्न आचार्यों के विभिन्न मत होते हैं और इस स्थिति में एक मत को न मानकर अधिक मतों को माना जाता है तो इसे ‘ अनेकान्तवाद ‘ कहते हैं । इसमें किसी भी विषय पर अनिश्चयात्मकता की स्थिति होती है ।

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