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SUSHRUT SAMHITA SHARIR STHAN

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सुश्रुत संहिता, शारीर स्थान

गर्भ व्याकरणम् नामकम् चतुर्थ अध्याय

"अथातो गर्भव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ।।।। यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ।।२ ।।"

पदच्छेद : १. अथ . २. अतः ३. गर्भव्याकरणम ४. शारीरम् ५.व्याख्यास्यामः ६.यथा ७. – उवाच ८. भगवान् ९ . धन्वन्तरिः

अनुवाद इसके बाद गर्भव्याकरण नामक शरीर की अर्थात् गर्भ के अंगो का विस्तार से वर्णन करेंगे । इसलिए यह अध्याय गर्भ व्याकरण कहलाता है । जैसा कि भगवान धन्वन्तरि ने कथन किया है ( १-२ ) ।

"अग्निः सोमो वायुः सत्वं रजस्तम ( श्च ) पंचेन्द्रियाणि भूतात्मेति प्राणाः ।" ( सु.शा. ४/३ चरकारः पाठान्तरे )

पदच्छेद : १. अग्निः २. सोमः ३ वायु : ४. सत्वम् ५. रजः ६ तमः ७.च ८. पंचेन्द्रियाणि ९ भूतात्मा १०. इति ११. प्राणाः

अनुवाद – अग्नि , सोम , वायु , सत्व , रज , तम , पंच इन्द्रियाँ ( ज्ञानेन्द्रियाँ ) और भूतात्मा ( जीवात्मा ) ये प्राण हैं । अग्नि अर्थात् पित्त अग्नि ही शरीर में पित्त को अन्तर्गत कुपित और अकुपित होकर शुभ , अशुभ कर्म करती है । सोम ही शरीर में श्लेष्म के अन्तर्गत कुपित और अकुपित होकर शुभाशुभ कर्म करता है । इनके साथ ही वायु त्रिगुण अर्थात् सत्व , रज , तम , नेत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पुरुष प्राण कहलाते है अर्थात् पंचभूतात्मक जड़ शरीर में जीवन या चैतन्यता के लक्षण जिनके कारण उत्पन्न होते हैं , वे तत्व प्राण कहलाते हैं ( ३ ) ।

“तस्य तस्य खल्वेवप्रवृत्तस्य शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य क्षीरस्येव सन्तानिका : सप्तत्वचो भवन्ति । तासां प्रथमाऽवभासिनी नाम , या सर्वान् वर्णानवभासयति , पंचविधां च छायां प्रकाशयति , सा व्रीहेरष्टादशभागप्रमाणा सिध्यपद्मकण्टका धिष्ठाना , द्वितीया लोहिता नाम षोडशभागप्रमाणा , तिलकालकन्यच्छवयङ्गाधिष्ठाना , तृतीया श्वेता नाम द्वादशभागप्रमाणा चर्मदलाजगल्लीमषकाधिष्ठाना , चतुर्थी ताम्रा नामाष्टभागप्रमाणा विविधकिलासकुष्ठाधिष्ठाना , पंचमी वेदिनी नाम पंचभागप्रमाणा , कुष्ठविसाधिष्ठाना , षष्ठी रोहिणी नाम व्रीहिप्रमाणा , ग्रन्थ्यपच्यर्बुदश्लीपदगलगण्डा सप्तमी मांसधरा नाम व्रीहिद्वयप्रमाणा भगन्दरविद्ध्यर्शोऽधिष्ठिाना । यदेतत् प्रमाण निर्दिष्टं तन्मांसलेष्ववकाशेषु , न ललाटे , सूक्ष्मामुल्यादिषु च , यतो वक्ष्यत्युदरेषु ” व्रीहिमुखेनाङ्गुष्ठोदरप्रमाणमवगाढं विध्येत् ” ( चि ० अ ० १४ ) इति ।।” ( सु ० शा ० ४/४ )

अनुवादः – इस प्रकार भूतात्माधिष्ठितशुक्र और शोणित के पक्व होने पर , जिस प्रकार दूध पर मलाई आती है उसी प्रकार सात प्रकार की त्वचा होती है । अर्थात् अग्नि के द्वारा परिपक्वकिये जाते हुए दूध के उपर जैसे मलाई की कई परते बनती है और इन सभी से मोटी मलाई बनती है । वैसे ही विदोषों के विशेषतया पित्त के द्वारा परिपक्व होते हुए गर्भ के पृष्ठ भाग पर स्वचा कई परतें बन जाती है और शरीर पर ये ही सभी परतें त्वचा बनती है । ये सात प्रकार की होती है । ये स्वतन्त्र त्वचाएँ न होकर एक त्वया के सात स्तर हैं । जिन स्तरों का कम बाहर से भीतर की ओर है ।
उनमें पहली अवभासिनी नामक त्वचा होती है , जो सब वर्गों को प्रकट करती है और पाँच प्रकार छाया को प्रकाशित करती है वह चावल के १८ ये भाग के समान मोटी होती है , इसी त्वचा में सिध्म , पद्मकण्टक आदि रोग होते हैं ।
दूसरी त्वचा लोहिता नाम की है । वह चावल के १६ वें भाग के बराबर होती है । इसमें तिलकालक , न्यच्छ ( छाई ) रोग रहते हैं ।
तीसरी त्वया श्वेता है । वह चावल के १२ वें भाग के बराबर होती है । उसमें चर्मदल , अजगल्लिका और मषक ( मस्सा ) का स्थान होता है ।
चौथी त्वचा ताम्रा नाम की है वह चावल के ८ वें भाग के बराबर होती है । उसमें नाना प्रकार किलास और कुष्ट और विसर्प होते है ।
पांचवी वेदिनी नाम की त्वचा है यह ५ वें भाग के बराबर मोटाई होती है । इसमें कुष्ट और विसर्प होते है ।
छठी रोहिणी त्वचा है यह चावल के बराबर मोटी होती है । इसमें प्रन्थि , अपची , अर्बुद , गलगण्ड विकार होते हैं ।
सातवीं मांसधरा है वह दो चावल के बराबर मोटाई में है । इसी से भगन्दर , विद्राधि , बवासीर रोग होते हैं ।
यह जो प्रमाण बताया है , वह मांसल स्थानों में समझना चाहिए । व्रीहिमुखेन ( व्रीहिमुख नामक यन्त्र से ) अगूठे की मोटाई के प्रमाण में गहरा छेद करना चाहिए । ऐसा न समझे उपरिनिर्दिष्ट प्रमाण लताट या छोटी छोटी अंगुलियों में का है ( ४ ) ।

" कला खल्वपि सप्त भवन्ति धात्वाशयान्तरमर्यादाः ।।" ( सु . शा . ४/५

पदच्छेद : १.कला : ३. अपि ४. सप्त२. खलु ५. भवन्ति ६. धात्वाशयान्तरमर्यादा :

अनुवाद : – कलायें भी सात होती हैं , वे धातु और आशयों के बीच मर्यादा सीमा का कार्य करती हैं ।

भवतश्चात्र-
” यथा हि सारः काष्ठेषु छिद्यमानेषु दृश्यते । तथा हि धातुमासेषु छिद्यमानेषु दृश्यते।।६ ।।”
“स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्ततांश्च जरायुणा ।। श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान् विदुः ।। “( सु . शा . ४/७ )

पदच्छेद : १.भवत २ . च 3 .अत्र ४.यथा ५.हि ६. सार ८ . दृश्यते १५ दरयते १८. प्रतिछन्नान् २५. अपि अनुवाद : हुए और ४ ७. काष्ठेषु विद्यमानेषु १०. तथा १२. धातुः १३. मासेषु १४. छिद्यमानेषु १६. स्नायुभिः १ ९ . सन्ततान् २०. च २१. जरायुणा २२. श्लेष्मणा २३. वेष्टितान् २६. कलाभागान् २८. तान् २ ९ . विदुः इति एकोन त्रिंशदात्मकं सूत्रम् ।

अनुवाद -जैसे लकड़ी काटने पर लार का दर्शन होता है उसी प्रकार मांस को काटने पर धातु का दर्शन होता है । वही रस , और रक्त सभी द्रव्य है । स्नायुयों से ढके जरायु ( झिल्ली ) से व्याप्त तथा कफ से बंधे हुए भागों को कला भाग कहते हैं । जैसे वृक्ष का सार अर्थात् धारक पोषक देखने के लिए उपर का काष्ठ या आवरण निकालना पडता है और निकलने के बाद वह दिखाई देता है , वैसे ही शरीर के धारक पोषक पदार्थों को देखने के लिए उनके उपर का आवरण निकालना पड़ता है और निकालने के बाद वह दिखाई देता है अर्थात् शरीर के सभी धातुओं के उपर आवरण होता है और यही आवरण कला कहलाते हैं ( ६)। कला रुप जो आवरण है वे स्नायुओं से , जरायुसदृश जाल से या श्लेष्मा से निर्मित है अर्थात् नायु , जरायु और श्लेष्मा ये कला के उपादान कारण है । कोई कला श्लेष्मा से , कोई स्नायुओं से , कोई जरायु से और कोई इनके मिश्रण से निर्मित होती है ( ७ ) ।

" तासां प्रथमा मांसधरा , यस्यां मांसे सिरास्नायुधमनीस्रोतसां प्रतानाः भवन्ति ।। यथा बिसमृणालानि विवर्धन्ते समन्ततः ।। भूमौ पङ्कोदकस्थानि तथा मासे सिरादयः ।।" ( सुशा ० ४ / ८.९ )

पदच्छेद : १ . तासाम् २. प्रथमा ३. मांसधरा ४.यस्यात ५. मासें ६. सिरास्नायुधमनी – सोतसान ७ . प्रतानाः ८ भवन्ति ९.यथा १०. बिसमृणालानि ११. विवर्धन्ते १२ .गांमारा १३. भूमौ इति सप्तदशपदात्मकं सूत्रम् ।। १४. पड्कोदकल्यानि १६. मांसे १७. सिरादयः

अनुवाद : – उन सात कलाओं में से प्रथम मांसधरा नामक कला है जिसमें शिरा , रनम्यु , धमनी और स्रोतसों की शाखाएं होती है भूमि पर पंक और जल में रहने वाले बिस तन्तु मृणाल ( कमलनाल जैसे चारों ओर बढ़ते हैं , उसी प्रकार मांस में सिरा आदि बढ़ते हैं । जैसे कीचड़ युक्त जल में स्थित कमलनाल के तन्तु भूमि में चारों ओर फैलते हैं , वैसे ही मॉस में सिरादि फैलते हैं मॉस में जो रक्त रहता है वह मांसधरा कला में रहता है । शरीर में रक्त का संचरण तीन प्रकार के मार्गों से होता है- धमनी , सिरा , स्रोतस् या केशिका अर्थात् मांस के भीतर जो रक्त होता है , उसका आधार केशिकाएँ होती है ( ८ – ९ )

"द्वितीया रक्तधरा , मांसस्याभ्यन्तरतः , तस्यां शोणितं , विशेषतश्च सिरासु यकृत्प्लीहाश्च भवति ।। वृक्षाद्यथाभिप्रहतात् क्षीरिणः क्षीरमावहेत् ।। मांसादेवं क्षतात्क्षिप्रं शोणितं संप्रसिच्यते ।।" ( ४ / १०-११ )

• पदच्छेदः
१. द्वितीया २ . रक्तधरा ३ . मांसस्य ४.अभ्यन्तर : ५.तस्याम् ६. शोणितम् ७. विशेषत : ८ . च ९ . सिरासु १०. यकृत्प्लीह्रोः ११. च १२. भवति १३. वृक्षात् १४. यथा १५. अभिप्रहतात् १६. क्षीरिण : १७. क्षीरम् १८. आवहेत् १ ९ . मांसात् २०. एवम् २१. क्षतात् २२. क्षिप्रम् २३. शोणितम् २४. संप्रसिच्यते

अनुवाद – दूसरी रक्तधरा नामक कला है । यह मांस के भीतर से जाती है । उसमें रक्त का संवहन होता है । यह रक्तधरा कला विशेषरुप से शिराओं में , यकृत में , प्लीहा में होती है । जैसे दूध वाले वृक्षों से आघात करने पर दूध आता है जैसे – गूलर , वट आदि । उसी प्रकार काटे माँस से खून टपकता खून टपकता है ( १०-११ ) ।

"तृतीया मेदोधरा , मेदो ही सर्वभूतानामुदरस्थमण्वस्थिषु च महत्सु च मज्जा भवन्ति स्थूलास्थिषु विशेषेण मज्जा त्वभ्यन्तराश्रितः । अथेतरेषु सर्वेषु सरक्त मेद उच्यते ।। शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता ।।" ( ४ / १३-१४)

•पदच्छेद : १ . तृतीया २ मेदोधरा ३ मेद : ४. हि ५ सर्वभूतानाम् ६ . ७. अण्वस्थिषु ८ . च महत्सु १०. च ११ . मज्जा १२. भवति १३. स्थूलास्थिपु १४. विशेषण १५. मज्जा १७. अभ्यन्तराश्रितः १८ . अथ १ ९ . इतरेषु २०. सर्वेषु २२. मेद : २३. उच्यते २४. शुद्धमांसस्य २५. य : २६. स्नेहः २७. सा २८. वसा २ ९ . परिकीर्तिता

अनुवाद – तीसरी मेदोधरा है । यह सर्व प्राणिमात्रों के उदर में तथा छोटी -छोटी रहती है । हड्डियों में रहती है बड़ी हड्डियों में मज्जा रहती है । विशेषरूप से स्थूल अस्थियों में मज्जा इनके अतिरिक्त इतर ( सूक्ष्म ) सब हड्डियों में रक्त के साथ मेद रहता है । शुद्ध मांस को जो स्नेह रहता है , वह वसा नाम से कहा जाता है । मेद अर्थात् चरबी मनुष्य के शरीर में कम या अधिक मात्रा में सभी जगह व्याप्त रहती है । व्यक्ति स्थूल होने के कारण यह चरबी अधिक मात्रा में उदर , और छोटी हड्डियों वाले अंगों में रहती है । मनुष्य शरीर में चरबी मज्जा में , त्वचा के नीचे , मांस में और उदर के भीतर उपस्थित रहता है । आयुर्वेद में शरीरगत चरबी के लिए मज्जा , वसा , मेद और रक्तमेद इस तरह शब्द प्रयुक्त होते है । बड़ी हड्डियों में पीलीमज्जा होती । छोटी हड्डियों में लाल मज्जा होती है । क्योंकि इसमें चरबी बहुत कम होती है और उससे रक्त के लाल कण जिनसें उत्पन्न होते हैं वे सेल होते है और इन्ही के कारण इनका वर्ण लाल होता है । केवल मांस का स्नेह होता है वह वसा कहलाता है ( १३-१४ )

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