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SUSHRUT SAMHITA SHARIR STHAN

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• सुश्रुत संहिता, शारीर स्थान

"गृहीतगर्भाणामार्तवहानां स्रोतसां वान्यवरुध्यन्ते गर्भेण तस्माद्गृहित गर्भाणामार्तवं न दृश्यते , ततस्तदधः प्रतिहतमूर्वमागतमपरं चोपचीयमानमपरेत्यभि धीयते , शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोरावभिन्नतिपंद्यते , तस्माद्गर्भिण्यः पीनोन्नतपयोधरा भवन्ति ।।" ( सु . शा . ४/२४ )

पदच्छेदः
१. गृहीतगर्भाणाम्
२ . आर्तववहानाम्
३ . स्रोतसाम्
४. वर्त्मानि
५.अवरूध्यन्ते
६ . गर्भेण
७. तस्मात्
८.गृहीतगर्भाणाम्
९.आर्तवम्
१०. न
११. दृश्यते
१२ . तस्मात्
१३. तत्
१४ . अध : प्रतिहतम्
१५. ऊर्ध्वम्
१६. आगतम्
१७ . अपरम्
१८. च
१ ९ . उपचीयमानम्
२० . अपरा
२१. इति
२२. अभिधीयते
२३. शेषम्
२४. च
२५. ऊर्ध्वतरम्
२६. आगतम्
२७. पयौधरौ
२८. अभिप्रतिपद्यते
२ ९ . तस्मात्
३०. गर्भिण्य :
३१. पीनोन्नतपयोधराः
३२. भवन्ति

अनुवाद – गर्भवती स्त्रियों में आर्त्तववह स्रोतो के मार्ग गर्भ के कारण रूक जाते हैं , इसलिए गर्भवती स्त्रियों का आर्त्तव दिखता नहीं , किन्तु वह रूका हुआ आर्त्तव नीचे न जाते हुए ऊपर की ओर एकत्र होता है जिसे अपरा कहते हैं । शेष रूका हुआ आर्त्तव स्तनों को प्राप्त होता है , जिससे गर्भिणी के स्तन पुष्ट तथा उन्नत हो जाते हैं ।
गर्भ के कारण आर्तवस्राव बंद हो जाता है । आर्तवस्राव का घनिष्ठ सम्बन्ध बीजकोष के साथ होता है । संक्षेप में गर्भ अपनी उपस्थिति से और श्लेष्मल कला की मोटाई के कारण आर्तव का मार्ग बंद करता है द्रव्य गर्भाशय को गर्भग्रहण करने योग्य बनाता है तथा गर्भाधान होनेपर गर्भाशय में उसके पोषण के लिए आवश्यक परिवर्तन करता है , वही द्रव्य गर्भोत्पत्ति के पश्चात् उसके पोषण के लिए स्तनों की भी वृद्धि करता है । जिससे गर्भिणी के स्तन पुष्ट तथा उन्नत हो जाते हैं ( २४ )।

"गर्भस्य यकृत्प्लीहानौ शोणितजौ , शोणितफेनप्रभव : पुप्फुसः , शोणितकिट्टप्रभव : उण्डुक :। "( सु ० शा ० ३/२४ )

पदच्छेद :
१. गर्भस्य
२. यकृत्प्लीहानौ
३. शोणितजौ
४.शोणितफेनप्रभवः
५.पुप्फुस :
६. शोणितकिट्टप्रभवः
७.उण्डुकः

अनुवाद – गर्भ के यकृत , प्लीहा , रक्त से पैदा होते है । रक्त के फेन से पुप्फुस ( फेफड़ा ) उत्पन्न होता है । रूधिर के मल से ‘ उण्डुक ‘ पैदा होता है ( २४ ) ।

“असृजश्लेष्मश्चापि यः प्रसाद : परोमतः ।
तं पच्यमानं पित्तेन वायुश्चाप्यनुधावति ।। ४/२६
ततोऽस्यान्त्राणि जायन्ते गुदं बस्तिश्च देहिनः ।
उदरे पच्यमानानां आध्मानाद्रुक्मसारवत् । २८ ।। कफशोणितमांसानां साराज्जिव्हा प्रजायते । यथार्थमूष्मणायुक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत् ।
अनुप्रविश्य पिशितं पेशीविभजते तथा ।
मेदसः स्नेहमादाय सिरा स्नायुत्वमाप्युयात् ।।२९ ।।
सिराणां च मृदुः पाक : स्नायूनां च ततः खरः ।
आशय्याभ्यासयोगेन करोत्याशयसंभवम् ।।” ४।३० ।।

पदच्छेद :
१. असृजः
२. श्लेष्मण :
३ . य
४ अपि
६ . प्रसादः
७. पर :
८ . मतः
९ . तम्
१०. पच्यमानम्
११. पित्तेन
१२. वायुः
१४. अपि
१५. अनुधावति
१६. ततः
१७. अन्वाणि
१८. जायन्ते
१ ९ . गुदम्
२०. बस्ति :
२१. च
२२. देहिनः
२३. उदरे
२४. पच्यमानानाम्
२५. आध्यानात्
२६. रूक्मसारवत्
२७. कफशोणितमांसानाम्
२८. सारात्
२ ९ . जिहा
३०. प्रजायते
३१. यथार्थम्
३२. ऊष्मणा
३३. युक्तः
३४. वायुः
३५. स्रोतांसि
३६. दारयेत्
३७. अनुप्रविश्य
३८. पिशितम्
३ ९ . पेशीः
४०. विभजते
४ १ . तथा
४२. मेदसः
४३. स्नेहम्
४४. आदाय
४५. सिरास्नायुत्वम्
४६. आजुयात् ।
४७. सिराणाम्
४८. च / तु
४ ९ . मृटुः
५०. पाक :
५१. स्नायूनाम्
५२. च
५३. ततः
५४. खर .
५५. आशय्याभ्यासयोगेन
५६. करोति
५७. आशयसंभवम्।

अनुवाद – रक्त और कफ जो उत्तम सार भाग है उसको पित्त से पचाते समय वायु भी उधर दौडती है ( २६ ) ।
जिससे प्राणियों की आंतें , गुदद्वार और बस्ति उत्पन्न होती है । जिव्हा की उत्पत्ति – उदर ( पेट ) में पचने वाले कफ , रक्त और मांस सत्व से जिव्हा को उत्पत्ति होती है । जैसे – धौंकने पर सुवर्ण का सार भाग शेष रहता है । वैसे ही जिव्हा भी कफ , रक्त , और मांस का सार होती है जैसे समुचित ऊष्णता से युक्त होती हुई वायु स्रोतों को विदीर्ण करती है , उन्हें बड़ाती है उसी प्रकार वही वायु मांस को प्राप्त होकर पेशियों के रूप में विभक्त करती है ( २७-२९ ) ।
स्नायु तथा आशयों की आपति- सिरा भेद का स्नेह लेकर स्नायुत्व को प्राप्त होती है । शिरा और स्नायु इनमें अन्तर यह है कि शिराओं का पाक मृदु रहता है और स्नायुओं का जाक उससे ( शिराओं ) से कठिन ( खर ) होता है । बार – बार रहने का अभ्यास करते करते ( वायु ) आशयों की उत्पत्ति करती है ( ३० ) ।

"रक्तमेद : प्रसादावृक्को , मांसाहक्कफमेदः प्रसादाद्वृषणौ शोणितकफप्रसादजं हृदयं यदाश्रया हि धमन्यः प्राणवहाः , तस्याधो वामतः प्लीहा पुप्फुसश्च , दक्षिणतो यकृत्वलोम च , तद्विशेषेण चेतनास्थानम् , अतस्तस्मिंस्तमसा वृते सर्वप्राणिनः स्वपन्ति ॥३१ भवन्ति चात्र- पुण्डरीकेण सदृशं हृदयं स्यादधोमुखम् । जागृतस्तद्विकसति स्वपतश्च निमीलति "॥३२ ॥

पदच्छेद –
१. रक्तमेदःप्रसादात्
२. वृक्को
३. मांसाहक्कफमेदः प्रसादात्
४. वृषणौ
५. शोणितकफप्रसादजम्
६. हृदयम्
७.यदाश्रया :
८. हि
९.धमन्यः
१०. प्राणवहा :
११. तस्य
१२. अध :
१३. वामतः
१४. प्लीहा
१५. पुप्फुस :

१७. दक्षिणत :
१८. यकृत्
१ ९ . क्लोम
२०. च
२१. तत
२२. विशेषण
२३. चेतनास्थानम्
२४. अत :
२५. तस्मिन्
२६. तमसा
२७. आवृते
२८. सर्वप्राणिनः
२ ९ . स्वपन्ति
३०. भवन्ति
३१. च
३२. अत्र
३३. पुण्डरीकेण
३४. सदृशम्
३५. हृदयम्
३६. स्यात्
३७. अधोमुखम्
३८. जागृतः
३ ९ . तत्
४०. विकसति
४१. स्वपत :
४२. च
४३.निमीलति

अनुवाद – रक्त और मेद के सार से वृक्क ( गुर्दे ) बनते हैं । मांस और रक्त , कफ के सार से हृदय बनता है । जिसके आधार से प्राणवहा धमनियाँ रहती है । उसके नीचे बाई ओर प्लीहा और फुप्फुस है । दक्षिण की ओर यकृत ( जिगर ) और क्लोम है । हृदय यह विशेष करके चेतना स्थान है । इसलिए तम से जब हृदय आच्छादित होता है तब सब प्राणिलोग सो जाते हैं हृदय का रूप – कमल के समान हृदय अधोमुख होकर रहता है । जागृतावस्था में प्रफुल्लित रहता है और सुप्तावस्था में संकुचित रहता है ।
हृदय को शरीर का वह अवयव कहा जाता है जो संकुचन और विकसन से रक्त को सदैव लिन रखता है । संक्षेप में , सम्पूर्ण शरीर को प्राण देने वाली वाहिनियाँ हृदय से सम्बन्धित रहती टय को आयुर्वेद में कमल की उपमा दी गई है । जिसका आकार दिन में बड़ता है और रात हे जाती है ( ३२ ) ।

" निद्रा तु वैष्णवी पाप्मानमुपदिशन्ति , सा स्वभावत एव सर्वप्राणिनोऽभिस्पृशति ।
तत्र यदा संज्ञावहानि स्रोतांसि तमोभूयिष्ठः श्लेष्मा प्रतिपद्यते तदा तामसी नाम निद्रा सम्भवत्यनवबोधिनी , सा प्रलयकाले , तमोभूयिष्ठानामहः सु निशासु च भवति , रजोभूयिष्ठानामनिमित्तं , सत्वभूयिष्ठानामर्धरात्रे , क्षीणश्लेष्मणामनिलबहुलानां मनः शरीराभितापवतां च नैव , सा वैकारिकी भवति ।।" ४/३३

पदच्छेद :
१. निद्राम्
२. तु
३. वैष्णवीम्
४.पाप्मानम्
५. उपदिशन्ति
६.सा
७. स्वभावतः
८.एव
९ . सर्वप्राणिनः
१०. अभिस्पृशति
११. तत्र
१२. यदा
१३. संज्ञावहानि
१४. स्रोतांसि
१५. तमोभूयिष्ठः
१६. श्लेष्मा
१७. प्रतिपद्यते
१८. तदा
१ ९ . तमसी
२०. नम
२१. निद्रा
२२.सम्भवति
२३. अनवबोधिनी
२४.सा
२५. सा
२६. तमोभूयिष्ठान्
२७. अहःसु
२८. निशासु
२ ९ . च
३०. भवति
३१. रजोभूयिष्ठानाम्
३२. अनिमित्तम्
३३. सत्वभूयिष्ठानाम्
३४. अर्धरात्रे
३५. क्षीणश्लेष्माणाम्
३६. अनिलबहुलानाम्
३७ . मनः शरीराभितापवताम्
३८. च
३ ९ . न
४०. एव
४१. सा
४२. वैकारिकी
४३. भवति।

अनुवाद – निद्रा यह विष्णु की माया है । इसे पापिनी कहते हैं । क्योकि यह सब सब शुभ कर्मो के व्यापार को नाश करती है जब तमोगुण अत्यधिक कफ , संज्ञावह स्रोतो को प्राप्त करता है । तब तामसी निद्रा होती है । जो ज्ञान नहीं होने देती है । वह प्रलय काल में आती है । तमोगुण युक्त प्राणियों को दिन और रात निद्रा आती है । रजोगुण , युक्त प्राणियों को कभी रात में कभी दिन में निद्रा आती है ।
उनके निद्रा का समय कभी निश्चित नहीं होता है , क्योंकि रजोगुण चंचल प्रकृति वाला होता है । सत्वभूयिष्ठ लोगों की आधी रात में निद्रा आती है । जिसका कफ क्षीण हो गया है । मन और शरीर में पीडा होती हो तो उन्हें निद्रा आती ही नहीं , उसे वैकारिकी निद्रा कहते हैं । निद्रा तम से उत्पन्न हुई है और तम निद्रा , आलस्य आदि का मूल है , इसलिए निद्रा पाप्मा कहलाती है ( ३३ ) ।

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