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SUSHRUT SAMHITA SHARIR STHAN

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सुश्रुत संहिता शारीर स्थान

" चतुर्थी श्लेष्मधरा , सर्वसन्धिषु प्राणभृतां भवति ॥ स्नहाभ्यक्ते यथा ह्यक्षे चक्रं साधु प्रवर्तते ।।
सन्धयः साधु वर्तन्ते संशिलष्टा श्लेष्मणा तथा ।।" ( सुशा ० ४/१५ )

पदच्छेदः
१. चतुर्थी
२. श्लेष्मधरा
३ . सर्वसन्धिषु
४.प्राणभृताम्
५ . भवति
६.स्नेहाभ्यक्ते
७.यथा
८.हि
९ . अक्षे
१०. चक्रम्
११. साधु
१२. प्रवर्तते
१३. सन्धयः
१४. साधु
१५. वर्तन्ते
१६. संश्लिष्टा :
१७. श्लेष्मणा
१८. तथा इति अष्टादशपदात्मकं सूत्रम् ।।

अनुवाद – प्राणियों की सर्व सन्धियों में रहने वाली कला श्लेष्म धरा है । जिस प्रकार तेल डालने पर अक्ष व चक्र अच्छी प्रकार घूमता है वैसे ही श्लेष्मा से युक्त सन्धियाँ भी अच्छी तरह घूमती हैं । शरीर में सन्धि दो प्रकार की होती है – स्थिर और चेष्टांवान् । सभी चेष्टावान् सन्धियों में श्लेष्म- धरा से निकला हुआ श्लेष्मा लिप्त होने से गति के समय आवाज नहीं होती , अंग कम घिसते है , अधिक समय तक काम देते है , मनुष्य अधिक समय तक कार्य करने में सक्षम रहता है । जिस प्रकार यहाँ पर तैल लगे हुए पहिये का उदाहरण दिया गया है ( १५ ) ।

"पंचमी पुरीषधरा नाम , याऽन्तः कोष्ठे
मलमभिविभजते पक्वाशयस्था ।१६ ।।
यकृत्समन्तात् कोष्ठं च तथाऽत्राणि समाश्रिता ।
उण्डु ( न्दु ) कस्थं विभजते मलं मलधरा कला ।। ( सु ० शा ० ४/१७ )

पदच्छेद :
१ . पंचमी
२ . पुरीषधरा
३ . नाम
४. या
५ . अन्त : कोष्ठे
६ . मलम्
७ . अभिविभजते
८.पक्वाशयस्था
९.यकृत्समन्तात्
१०. कोष्ठम्
११ . च
१२. तथा
१३. अन्त्राणि
१४. समाश्रिता
१५. उण्डुकस्थं
१६. विभजते
१७. मलम्
१८. मलधरा
१ ९ . कला

अनुवाद – पाँचवी कला का नाम पुरीषधरा है । जो कोष्ठ में रहकर पक्वाशय का आश्रय करती हुई मल का विभाजन ( अलग ) करती है यकृत के पास कोष्ठ और आंतों का आश्रय करती हुई , उण्डुक में रहने वाले मल को विभक्त करने वाली कला मलधरा है । मुँह द्वारा ग्रहण किया गए खाद्य पदार्थो का पाचन और सात्म्यभाग का शोषण क्षुद्रान्त्र में होता है । इसके पश्चात् स्थूलान्त्र का कार्य मल में स्थित जल को सुखाना होता है । इस प्रकार क्षुद्रात्र और स्थूलान्त्र दोनों मल को विभक्त करते है ( १६-१७ ) ।

"षष्ठी पित्तधरा , या चतुर्विधमन्नपानमामाशयात् प्रच्युतं पक्वाशयोपस्थितं धारयति ।। ४/१८
अशितं खादितं पीतं लीढं कोष्ठगतं नृणाम् ।।
तज्जीर्यति यथाकालं शोषितं पित्ततेजसा।।"४ / १ ९

पदच्छेद :
१ षप्ठी
२.पित्तधरा
३ . या
४. चतुर्विधम्
५.अन्नपानम्
६.आमाशयात्
७.प्रच्युतम्
८ . पक्वाशयोपस्थितम्
९.धारयति
१०. अशितम्
११ . खदितम्
१२. पीतम्
१३. लीढम
१४. कोप्ठगतम्
१५. नृणाम्
१६. तत्
१७. जीर्यति
१८. यथाकालम
१ ९ . शोपितम्
२०. पित्ततेजसा

अनुवाद – छठी पित्तधरा नामक कला है जो अशित अर्थात् भोजन किया गया , खाद्य अर्थात् खाया हुआ , पेय अर्थात् पीया हुआ , लेह अर्थात् चाटा हुआ ये जो चार प्रकार का अन्न है उसको आमाशय से निकलते हुए पक्वाशय की ओर जाते हुए धारण करती है यथा समय पचाती और शोपित करती है , वही पित्तधरा है ।
अशित अर्थात् रोटी , सब्जी इत्यादि पदार्थ जिनके लिये चबाने की आवश्यकता होती है । खादित अर्थात् लड्डू आदि पदार्थ जिनको अधिक चबाना पड़ता हो । पीत अर्थात् दूध , रस आदि पीने के पदार्थ । लीढ अर्थात् चाटने योग्य पदार्थ रबड़ी आदि । सेवन किया हुआ अन्न पाचित और शोषित होकर मल के रुप में स्थूलान्त्र में आता है । यह कार्य पिनधरा नामक कला करती है ( १८-१९ ) ।

“सप्तमी शुक्रधरा या सर्वप्राणिनां सर्वशरीरव्यापिनी।।४ / २० यथा पयसि सर्पिस्तु गुढश्चेक्षौ रसो यथा ।
शरीरेषु तथा शुक्रं नृणां विद्याभिषग्वरः।।४ / २१
द्वयङ्गुले दक्षिणे पार्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः ।।
मूत्रस्रोत : पथाच्छुक्र पुरुषस्य प्रवर्तते।।२२ ।।
कृत्स्नदेहाश्रितं शुक्र प्रसन्नमनसस्तथा ।।
स्त्रीषु व्यायच्छतश्चपि हर्षात्तत् संप्रवर्तते “॥२३ ॥

पदच्छेद :
१. सप्तमी
२. शुक्रधरा

४ सर्वप्राणिनाम्
५.सर्वशरीरव्यापिनी
६ यथा
७ पयसि
८.सर्पिः
९.तु
१०. गूढः
११.च
१२. इक्षौ
१३. रस
१४ यथा :
१५. शरीरेषु
१६. तथा
१७.शुक्रम्
१८ . नृणाम्
१ ९ . विद्यात्
२० .भिषग्वरः
२१. द्वयङ्गुले
२२. दक्षिणे
२३. पार्थे
२४. बस्तिद्वारस्य
२५. च
२६. अपि
२७. अधः
२८. मूत्रस्रोत : पथात्
२ ९ . शुक्रम्
३०. पुरूषस्य
३१. प्रवर्तते
३२. कृत्स्नदेहाश्रितम्
३३ . गुक्रम्
३४. प्रसन्नमनसः
३५ . तथा
३६. स्त्रीषु
३७. व्यायच्छतः
३८. च
३९. अपि
४०. हर्षात्
४१. तत्
४२. संप्रवर्तते ।

अनुवाद – सप्तमी शुक्रधरा कला है जो सम्पूर्ण प्राणियों के पूरे शरीर में व्याप्त रहती है ( २० ) । जैसे दूध में घी सर्वत्र रहता है , गन्ने मे जिस प्रकार गुड़ रहता है । उसी प्रकार प्राणियों के शरीर में शुक्र रहता है ( २१ ) । बस्ति द्वार के भी नीचे दो अगुंल दक्षिण और बायें मूत्र वहन मार्ग से पुरूष का शुक्र निकलता है । प्रसन्न मन होकर स्त्रीप्रसंग करने वाले पुरूष के सर्वशरीर में रहने वाला शुक्र हर्ष के कारण प्रवृत्त होता है ( २२-२३ ) ।

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