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STANYA EVAM ARTAVA

by

स्तन्य ( दूध ) तथा आर्तव

उपधातु

इसका अर्थ है धारण तथा पोषण करना ।

धातुयें शरीर का धारण तथा पोषण करती हैं । रस , रक्त , मांस , मेद , मज्जा तथा शुक्र ये सात धातुयें शरीर का धारण तथा पोषण करती हैं । इन धातुओं के अतिरिक्त सात ही उपधातुयें हैं । उपधातु धातुओं के समान शरीर का धारण तो करती हैं परन्तु पोषण नहीं करती हैं ।

रस से स्त्रियों में स्तन्य ( दूध ) तथा आर्तव , रक्त के कण्डरा तथा सिरा , मांस से वसा तथा छः त्वचा , मेद से स्नायु की उत्पत्ति होती है ।
अस्थि , मज्जा तथा शुक्र धातुओं से उपधातुओं की उत्पत्ति नहीं होती है ।

स्तन्य

उत्पत्ति
“रसात् स्तन्यसम्भवः ।।”(च ० चि ०15 / 16)

रस धातु से स्तन्य ( दूध ) की उत्पत्ति होती है ।

पचे हुए आहार से उत्पन्न रस का प्रसाद तथा मधुर भाग जो समस्त शरीर में परिसंचरित होता रहता है , स्तनों में पहुंचकर परिवर्तित हो स्तन्य कहलाता है । अर्थात् जब रस धातु [ प्लाज्मा ] स्तन में पहुंचता है तब दुग्ध कोशिकाओं [ milkalveoli ] में स्थित विशेष कोशिकायें रस धातु से दूध उत्पादक द्रव्यों को ग्रहण कर स्तन्य [ दूध ] की उत्पत्ति करती हैं ।

शुद्ध स्तन्य की परीक्षा

स्तन्यसम्पत् [ दूध के शुभगुण ] जो दूध वर्ण , गन्ध , रस तथा स्पर्श में स्वाभाविक हो , शीत , तरल , शंख के समान आभा वाला , फेन एवं तन्तुविरहित हो , जल में डालने से जल में मिल जाए तथा जल श्वेत एवं मधुर हो जाए , वह दूध शुभ गुणों वाला , उत्तम एवं आरोग्य तथा बलदाता होता है ।

शुद्ध दूध न तो जल में तैरता है अर्थात् जल से हल्का नहीं होता है और न जल में डूबता है अर्थात् जल से भारी नहीं होता है ।

स्तन्य वृद्धि के लक्षण

“स्तन्यं स्तनयोरापीनत्वं मुहुर्मुहुः प्रवृत्तिं तोदं च ।।”( सु ० सू ० 15/60)

सामान्य से अधिक दूध की उत्पत्ति में वृद्धि होने से स्तन स्थूल हो जाते हैं । जिसके तनोव होने के कारण पीड़ा होती है तथा बार – बार दुग्धस्राव की प्रवृत्ति होती हैं।

स्तन्य क्षय के लक्षण

“स्तन्यक्षये स्तनयोर्लानता स्तन्यासम्भवोऽल्पता वा ।”( सु ० सू ० 15/12 )
दुग्ध उत्पत्ति सामान्य से कम होने पर स्तन सिकुड़ कर छोटे हो जाते हैं , दूध की उत्पत्ति कम हो जाती है अथवा समाप्त हो जाती है ।

आर्तव

आर्तव के पर्याय – शोणित , रज , ऋतु असृक् , मासिक स्राव आदि हैं ।

आर्तवकाल की मर्यादा

स्त्रियों में रज नाम से जो रक्त होता है उसकी उत्पत्ति रसधातु से होती है । यह रज स्त्रियों में बारह वर्ष की आयु के पश्चात् प्रकट होकर जरावस्था में परिपक्व शरीर के कारण पचास वर्ष की आयु के पश्चात् बन्द हो जाता है । प्रत्येक मास तीन दिन तक रज का स्राव होता है ।

आर्तव का कार्य

“रक्तलक्षणमार्तवं गर्भकृच्च गर्भो गर्भलक्षणम् ।।”

रक्त के समान लक्षण वाला आर्तव गर्भस्थिति का कारक है । गर्भ की स्थिति हो जाने पर गर्भाशय में गर्भ के लक्षण उत्पन्न करता है । (सु ० सू ० 15/19)

आर्तव वृद्धि
“आर्तवमङ्गमर्दमतिप्रवृत्तिं दौर्बल्यं च ।”( सु ० सू ० 15/21 )

आर्तवस्राव की मात्रा सामान्य से अधिक होने पर अंगों में पीड़ा , अधिक रजःप्रवृत्ति तथा दुर्बलता होती है ।

आर्तव क्षय
“आर्तवक्षये यथोचितकालादर्शनमल्पता वा योनिवेदना च ।”( सु ० सू ०15 / 16)

आर्तवक्षय में यथासमय रजोदर्शन न होना अथवा अल्पमात्रा में होना तथा योनि में वेदना ये लक्षण उत्पन्न होते हैं ।

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