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SROTAS SHARIR

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स्रोतस् शारीर

• व्याख्या- ” स्रवणात् स्रोतांसि । “

शरीर के वे सभी भाग जहाँ स्रवण ( गति ) क्रिया होती है , वे स्रोतस् हैं ।

• जिससे स्राव निकलता हो , वही स्रोतस हैं । स्रोत शब्द का अर्थ एक मिट्टी के घड़े ( मटके ) के उदाहरण से समझा जा सकता है । जिस प्रकार घड़े के अन्दर से पानी रिसकर ( Ooz out ) बाहर निकलता है । उसी प्रकार हमारे शरीर में cells के पदार्थों की स्रवण क्रिया होती है ।

• स्वरूप 

जिस धातु के जो स्रोत होते हैं , वे उस धातु के समान वर्ण वाले , गोल , मोटे , सूक्ष्म और आकृति में लम्बी लता के समान होते हैं । अर्थात् लतायें चारों तरफ फैलकर अपनी शाखा – प्रशाखाओं से व्याप्त रहती हैं । उसी प्रकार स्रोत भी अपनी शाखा एवं प्रशाखाओं से सारे शरीर में व्याप्त हैं ।

•पर्याय “

१. स्रोतांसि २. सिरा ३. धमनी 19. पन्थान ४. रसायन्य- ५. रसवाहिन्य- ६. नाड्य : ८. मार्गा ९ . शरीरच्छिद्राणि- Opening १०. संवृतासंवृत ११.स्थानानि १२.आशया।

• संख्या

आचार्य चरक के अनुसार स्रोतसों की संख्या = 13 है ।

आचार्य सुश्रुत के अनुसार स्रोतसों की संख्या = 11*2 = 22 है ।

आचार्य सुश्रुत के अनुसार बर्हिमुख स्रोतसों की संख्या = 9 पुरुषों में , 12 स्त्रियों में ।

• स्रोतसों के स्थान ( मूल )

१. प्राणवह स्रोतस्- हृदय और महास्रोतस

२. उदकवह स्रोतस् – तालु और क्लोम

३. अन्नवह स्रोतस् – आमाशय और वामपार्श्व

४. रसवह स्रोतस् – हृदय और दश धमनियाँ

५. रक्तवह स्रोतस् – यकृत और प्लीहा

६. मांसवह स्रोतस् – स्नायु , त्वक्

७. मेदोवह स्रोतस् – वृक्कौ और वपावहन ( वसा )

८. अस्थिवह स्रोतस् – मेद और जघन

९ . मज्जावह स्रोतस् – अस्थि और सन्धियाँ

१० शुक्रवह स्रोतस् – वृषण और शेफ ( मूत्रेन्द्रिय )

११. मूत्रवह स्रोतस् – वस्ति और वंक्षण |

१२. पुरीषवह स्रोतस् – पक्वाशय और स्थूलगुद |

१३ . स्वेदवह स्रोतस् – मेद और लोमकूप ( रोमकूप )

१४. आर्त्तववह स्रोतस् – x – X

• स्रोतसों के सामान्य कार्य

” स्रवणात् स्रोतांसि ” के अनुसार स्रोतसों का कार्य स्रवण ( गति ) करना है ।

1. स्रोतस् परिणाम प्राप्त धातुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक वहन करते हैं ।

2. शरीरस्थ भावों का पोषण करते हैं , जिससे वे क्षीण नहीं होते हैं ।

3. स्रोतस् के प्रकृतिस्थ रहने से शरीर स्वस्थ रहता है ।

4. मलों का वहन कर उन्हें शरीर से बाहर निकालते हैं ।

5. स्रोतस् विषयों अर्थात् संज्ञाओं के वेगों का वहन कर शरीर को अनुग्रहीत करते हैं ।

• स्रोतसों की दुष्टि के सामान्य लक्षण

•धातुओं का अधिक निकलना ।

•या बिल्कुल रूक जाना ।

•सिराओं में ग्रन्थि का पड़ जाना ।

•धातुओं का विमार्गगमन हो जाना ।

ये सभी स्रोतों की दुष्टि के लक्षण हैं ।

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