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SNSARG EVAM SANIPATA

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संसर्ग तथा सन्निपात

“संसर्गः सन्निपातश्च तद् द्वि त्रि क्षयकोपतः ।”( अ ० हु ० सू ० 1/12)

अपने स्वाभाविक प्रमाण से कम अथवा अधिक दो दोषों के संयोग को संसर्ग तथा तीनों के संयोग को सन्निपात कहते हैं ।

जब वातादि दोष पृथक् – पृथक् प्रकुपित होते हैं तो उनको पृथग्दोष अथवा एकदोष और उनसे उत्पन्न हुई व्याधि को पृथग्ज अथवा एकदोषज व्याधि कहते हैं ।
जब वातादि दोष दो – दो एक साथ मिलकर प्रकुपित होते हैं तो उनके संयोग को द्वंद्व द्विदोष अथवा संसर्ग कहते हैं तथा उन दो दोषों को संसृष्ट और उनके संयोग से उत्पन्न व्याधि को द्विदोषज अथवा संसर्गज कहते हैं ।

जब वातादि तीनों दोष मिलकर एक साथ प्रकुपित होते हैं तो उस संयोग को सन्निपात या त्रिदोष एवं तीनों मिले हुए दोषों को सन्निपतित और उनसे उत्पन्न व्याधि को त्रिदोषज अथवा सन्निपातज कहते हैं ।

• एक दोषज , संसर्गज तथा सन्निपातज व्याधियों में दोषों के न्यूनाधिक कल्पना भेद से व्याधियों के 62 उत्पादक कारण होते हैं । 63 वां संयोग सम वात – पित्त – कफ की साम्यावस्था का है और यह आरोग्य का कारण है ।

संसर्ग तथा सन्निपात चिकित्सा क्रम

“उपक्रमस्य हि द्वित्वाद् द्विधैवोपक्रमो मतः ।
एकः सन्तर्पणस्तत्र द्वितीयश्चापर्तणः ।।
वृहणो लंघनश्चेति तत्पर्यायावुदाहृतौ ।
वृहणं यवृहत्त्वाय लंघनं लाघवाय यत् ।।
देहस्य – ” (अ ० हृ ० सू ० 14/12)

दोषों की वृद्धि तथा क्षय से रोग होते हैं और इन रोगों की चिकित्सा में दो उपक्रम हैं- ( 1 ) संतर्पण तथा ( 2 ) अपतर्पण । संतर्पण का पर्याय वृंहण है तथा अपतर्पण का पर्याय लंघन है ।

जो शरीर की वृद्धि तथा पुष्टि करे वह बृहण है तथा जो शरीर में लघुता उत्पन्न करे वह लंघन है ।

वृंहण चिकित्सा का उपयोग क्षीण दोषों में तथा शरीर की क्षीणता में किया जाता है तथा लंघन ( अपतर्पण – वमन , विरेचन , निरूहण वस्ति , नस्यकर्म , रक्तस्रुति , पाचन एवं दीपन पदार्थों का सेवन , अन्न न खाना , जल न पीना , धूप का सेवन आदि लंघन कर्म हैं ) वृद्ध दोषों के शमन के लिए किया जाता है ।

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