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SHUSK EVAM AADRADRAVYA GRAHAY NIYAM

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शुष्क एवं आर्द्रद्रव्य ग्राह्य नियम

आयुर्वेदीय ग्रन्थों में औषधयोगों में घटक द्रव्यों का जो मान ( मात्रा ) बताया गया है , वह शुष्क द्रव्यों का बताया है । अतः आर्द्रद्रव्यों के ग्रहण में उक्त द्रव्य दुगुने मान में ग्रहण करने चाहिए । शुष्क द्रव्य गुरु एवं तीक्ष्ण वीर्य के होते हैं ।

“शुष्कं नवीनं यद्रव्यं योज्यं सकलकर्मसु ।

आर्द्रच द्विगुणं युज्यादेष सर्वत्र निश्चयः ।। “

( शा . सं . पू . ख . 1/48 )

औषध द्रव्यों की ग्राह्यग्राह्यता :

” रसविपाकप्रभावातिरिक्त प्रभूतकार्यकारिणी गुणे वीर्यम् इति संज्ञा ‘ ( चक्रदत्त )

अर्थात् द्रव्य रस , विपाक , प्रभाव आदि के अतिरिक्त जिस शक्ति ( गुण ) से कार्य करता है , उसे वीर्य कहते है । द्रव्य के जिस अङ्ग ( भाग ) में वीर्य होता है , उसी अङ्गविशेष का ग्रहण कर चिकित्सा में प्रयोग करना चाहिए ।

औषध द्रव्य संग्रहण

 साधारण या जाङ्गल देश में शीत , उष्ण , वायु , जल से परिपक्व औषधि कंकड़ , गड्ढ़ा – वल्मीक आदि से रहित , श्मशान , वधस्थान , मन्दिर , सभा स्थान , क्षार , बड़े – बड़े वृक्षरहित , जलाशय के समीप , स्निग्ध , कृष्ण , मधुर मृत्तिका युक्त , आफालकृष्ट भूमि में उत्पन्न और अनुपहृत गन्ध – रस – वर्ण आदि प्रभावयुक्त औषध द्रव्यों का संग्रहण श्रेष्ठ होता है ।

औषध संग्रह विधि :

गृहणीयात्तानि सुमनाः शुचिः प्रातः सुवासरे ।

आदित्यसंमुखो मौनी नमस्कृत्य शिवं हृदि ।।

साधारणधराद्रव्यं गृहणीयादुत्तराश्रितम् ।।

( शा . सं . पू . ख . 1 / 63-65 )

अर्थात् सभी प्रकार की औषधियाँ चिकित्सक द्वारा प्रसन्न चित्त होकर , मनसा – वाचा पवित्र होकर , प्रातःकाल , शुभ दिन , सूर्य की ओर की ओर मुख करके मौनधारण कर और हृदय में भगवान शिव को प्रणाम कर संग्रहण करनी चाहिए ।

आचार्य चरक ने शाखा एवं पत्र को वर्षा व बसन्त ऋतु में , मूल को ग्रीष्म व शिशिर ऋतु में , त्वक् – कन्द – क्षीर को शरद ऋतु में , सार – हेमन्त ऋतु में और पुष्प – फल को यथा ऋतु में संग्रह करने का निर्देश दिया है ।

आचार्य सुश्रुत ने प्रावृट् व वर्षा में मूल – पत्र , शरद में त्वक् , हेमन्त में क्षीर , बसन्त में सार एवं ग्रीष्म में फल लेने का निर्देश दिया है । किन्तु यह भी कहा है कि सृष्टि अग्निसोमीय होने से ऋतु के अनुसार ही औषध संग्रहण उचित नहीं है । सौम्यद्रव्य सौम्य ऋतु में तथा आग्नेय द्रव्य आग्नेय ऋतु में ग्रहण करने पर द्रव्यों में अव्यापन्न ( प्रचुर ) गुण होते हैं ।

द्रव्यों के अवयवों का संग्रहण

सभी फल सुपक्व होने पर गुणवान् होने के कारण उसी अवस्था में संग्रहण करना चाहिए । किन्तु बिल्व का फल अपक्व ही गुणवान् होने से अपक्व लेना चाहिए । कृमिजुष्ट , रोगग्रसित , अधिक पका हुआ ( सड़ा हुआ ) और अकाल में उत्पन्न अल्पपक्व फल अग्राह्य होता है

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