fbpx

SHUKRA DHATU

by

शुक्र धातु

• शुक्र की उत्पत्ति

“अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्रं प्रजायते ।।”( च ० चि ० 15/15 , अ . ह . शा . 3/62 )

मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है ।

• शुक्र का शरीर में स्थान

शरीर में अन्य धातुओं की उत्पत्ति के साथ ही साथ शुक्र धातु की भी उत्पत्ति होती है । यद्यपि बाल्यावस्था में भी शुक्र समस्त शरीर में उपस्थित रहना है परन्तु उसका कार्य दृष्टिगोचर नहीं होता है ।

• शुक्र के कार्य

शुक्र धातु धैर्य , च्युति , प्रीति , शरीर में बल , हर्ष तथा सन्तानोत्पत्ति के योग्य बीज ( डिम्ब एवं शुक्राणुओं ) की उत्पत्ति करता है । अतः शुक्रधातु गर्भ की उत्पत्ति करती हैं।

• शरीर में शुक्र का परिमाण

शरीर में शुक्र का परिमाण आधी अञ्जलि होता है ।

• शुक्रसार पुरुष के लक्षण

शुक्रसार व्यक्ति सौम्य तथा सौम्यदृष्टि ( कोमल दृष्टि ) वाले होते हैं नेत्र दूध से भरे हुए ( शुभ्र ) होते हैं , सदा प्रसन्न मन वाले अथवा बहुत काम वेग वाले होते हैं । दांत स्निग्ध , गोल , दृढ़ , परस्पर एक दूसरे से मिले हुए तथा उन्नत होते हैं । वर्ण और स्वर निर्मल तथा स्निग्ध होता है । ऐसे व्यक्ति कान्तिमान् एवं भारी नितम्बों वाले होते हैं ।

शुक्रसार पुरुष स्त्रियों के प्रिय तथा स्त्रियां पुरुषों की प्रिय , सुख ऐश्वर्यवान् , आरोग्य , धन , सम्मान तथा सन्तानवान् होते हैं।

• शुक्रक्षय के लक्षण

शरीर में शुक्र की क्षीणता होने पर वृषणों एवं शिश्न में वेदना होने लगती है । शुक्र का देर से स्खलन होना , शुक्र के साथ रक्त तक का आ जाना , मैथुन में दुर्बलता होना , मुख का शुष्क होना , क्लीवता एवं अरक्तता आदि क्षीण शुक्र के लक्षण हैं।

• शुक्रवृद्धि के लक्षण

शुक्र की अतिवृद्धि पर स्त्री संग की अधिक इच्छा , शुक्र का अधिक मात्रा में स्खलन तथा शुक्राश्मरी की सम्भावना बढ़ जाती है।

• दूषित शुक्र के लक्षण

शुक्र में आठ दोष पाये जाते हैं-
1.फेनिल [ झागदार ] ,

  1. तनु [ पतला ] ,
    3 . रूक्ष [ अस्निग्ध ] ,
    4.विवर्ण [ स्वाभाविक वर्ण का न रहना ] ,
  2. पूति [ दुर्गन्धमय ]
    6.पिच्छिल [ अधिक चिपचिपा हो जाना ] ,
    7.अन्य धातु संसृष्ट [ अन्य धातुओं से मिश्रित हो जाना ]तथा
  3. अवसादी [ स्खलन के समय अत्यन्त कष्ट का अनुभव करानेवाला अथवा जल के नीचे बैठ जानेवाला

Leave a Comment

error: Content is protected !!