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SHIRAVYADHYA VIDHI

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सिराव्यध विधि

• शुद्ध रक्त का लक्षण-

यह मधुर कुछ लवण रस का , कुछ शीत और कुछ उष्ण तथा असंहत ( द्रव ) होता है । इसका वर्ण लाल कमल- न – बीरबहूटी , स्वर्ण ( हेम ) , भेंड़ ( अवि ) और खरगोश ( शश ) के रक्त के समान लाल होता है , इससे ( रक्त से ) ही शरीर की स्थिति रहती है ।

• पित्तादि से दूषित रक्त-

यह ( रक्त ) प्रायः पित्तकारक द्रव्यों ( क्षार – अम्ल – लवण आदि ) और कफकारक द्रव्यों ( उड़द – तिल आदि ) से दूषित होता है ।

• दूषित रक्त से उत्पन्न रोग-

रक्त के कुपित होने से विसर्प ( Erysepelas ) , विद्रधि ( Abscesss ) , प्लीहा ( Spleenic enlargement ) , गुल्म ( Tumour ) , अग्निसदन ( अग्निमान्य ) , ज्वर ( Fever ) , मुख – नेत्र – शिरोरोग , मद , तृष्णा ( Thirst ) , मुख में लवण रस की प्रतीति होना , कुष्ठ ( Skin – disease ) , वातरक्त ( Gout ) , रक्तपित्त , कटु और अम्लीय उद्गार ( Belching ) , भ्रम ( चक्कर आना- Dizziness ) आदि होता है ।

शीत – उष्ण – स्निग्ध और रूक्ष आदि से चिकित्सा ( उपक्रान्ताः ) करने पर भी जो रोग ( गदा 🙂 ठीक से अच्छे नहीं होते हैं वो ‘ रक्तप्रकोपज ‘ होते हैं ।

• विसर्पादि में सिराव्यध-

इन ( उपरोक्त ) रोगों में उद्रिक्त ( बढ़े हुये ) रक्त को निकालने ( स्रावयितुं ) के लिये सिरा का व्यध करना चाहिये ।

• सिराव्यध के अयोग्य-

सोलह वर्ष से कम ( उन ) और सत्तर वर्ष से अधिक आयु में जिनका रक्त निकल गया हो । जिनका स्नेहन – स्वेदन न हुआ हो , या अत्यन्त स्वेदन ( Fomentation ) किया गया हो , वात के रोगियों , गर्भिणी , सूतिका , अजीर्ण Indigestion ) , रक्तपित्त , श्वास ( Dyspnoea ) , कास ( Cough ) , अतीसार ( Diarrhoea ) , उदर रोग ( Abdominal disease ) , छर्दि ( Vomiting ) , पाण्डु ( Anaemia ) और सर्वाङ्ग शोफ ( Oedema in whole body ) रोग से पीड़ित में स्नेहपान तथा पंचकर्म ( वमन – विरेचनादि ) किये जाने के बाद सिराव्यध नहीं करना चाहिये ।

सिरा को बांधकर नियंत्रित किये बिना , तिरछी ( तिर्यक् ) और बिना उभरी सिरा का वेधन नहीं करना चाहिये । अतिशीत या अतिउष्ण काल में , अति वायु के चलने पर , बादलों के होने पर ( अभ्रेषु ) , बिना आत्यायिक रोगी के और आत्ययिक रोगों को छोड़कर सिराव्यध नहीं करना चाहिये ।

• सिराव्यध का स्थान –

शिरोरोग एवं नेत्ररोगों में ललाट ( Fore – head ) की सिरा का या अपांग प्रदेश की या नासा के समीप की सिरा का वेधन करते हैं । कर्णरोगों में कर्ण के समीप की सिरा का , नासा रोगों में नासा के अग्रभाग में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिये । पीनस ( Rhinitis ) में नासा और ललाट के मध्य की सिरा का वेधन करना चाहिये ।

• सिराव्यध विधि-

 रोगी के शरीर ( तनु ) का स्नेहन कराकर सम्पूर्ण आवश्यक उपकरण को तैयार कर बलवान रोगी को स्वस्ति वाचन कराते हैं , इसके बाद स्निग्ध रसयुक्त अन्न के साथ प्रतिभोजन ( यवागू – पेया आदि ) कराते हैं । इसके उपरान्त अग्नि या धूप ( आतप ) के सेवन से स्वेदन ( पसीना आने पर ) होने के बाद घुटने ( जानु ) के बराबर ऊंचे आसन पर बिठाते हैं और रोगी के सिर को केश ( बालों ) के अन्त तक वस्त्र से बांध देते हैं तथा रोगी के कूपर ( कुहनी- Elbow ) को घुटने पर रखकर बैठा देते हैं ।

अब रोगी को मुठ्ठी में वस्त्र रखकर उसे मन्या नाड़ी को दबाने के लिये कहें साथ ही उसे निर्देश दें कि वह दांतों को कसकर भींच लें , खांसे और गण्डस्थलों ( गालों ) को फुलाने का प्रयत्न कर स्थानीय दबाव को बढ़ाये । अन्य व्यक्ति ( परिचारक ) द्वारा रोगी की कन्धरा ( गर्दन ) में वस्त्र को लपेटकर दबाने का निर्देश दें ।

वस्र बन्धन करते समय तर्जनी ( Index – finger ) को मन्या नाड़ी के साथ लगाकर बांधते हैं ( इससे अधिक दबाव द्वारा हानि की संभावना नहीं होगी ) , यह विधि केवल बहिर्मुख की सिराओं को उठाने के लिये ही है ।

• असम्यक् और सम्यक् रक्तस्राव होने पर-

रक्त का स्राव ठीक से न ( असम्यक् ) होने पर वेल्ल ( वायविडंग- L.N. Embelia Ribes Burm F. ) , त्रिकटु ( शुण्ठी Eng.- Ginger , L.N.- Zingiber – officinale Rose , काली मिर्च , Eng : Black – pepper , L.N.- Piper nigrum Linn . और पिप्पली , Eng.- Long pepper , L.N. – Piper longum Linn . ) , निशा ( हल्दी Eng.- Turmeric , L.N.- Curcuma longa Linn . ) , नत ( तगर Eng : -Indian valerian , L.N.- Valeriana wallichi DC ) , घर का धुवां ( आगार धूम ) , लवण और तेल से सिरा के मुख पर लेप करते हैं ।

सम्यक् रक्त का स्राव होने पर हल्के गरम तैल में नमक मिलाकर सिरा के मुख पर लगाते हैं।

• रक्तस्राव के पश्चात्-

यन्त्र के दबाव के कारण स्वस्थान ( अपने स्थान ) को छोड़कर दूसरे मार्ग में गये हुये दोष एवं रक्त जब तक अपने स्थान में न आ जायें तब तक हितकर आहार – विहार सेवन करना चाहिये ।

• शुद्ध रक्त का लक्षण-

जिसका वर्ण और इन्द्रियां प्रसन्न ( स्वच्छ ) हो इन्द्रियों के विषय ( शब्द – स्पर्शादि ) में इच्छायें हों , पक्तृ ( जठराग्नि ) की शक्ति नष्ट न हुयी ( अव्याहत ) हो , सुखी ( स्वस्थ ) हो , पुष्टि और बल से पूर्व हो ऐसे व्यक्ति को विशुद्ध रक्तवाला कहा जाता है ।

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