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SHIRA SHARIR

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सिरा शारीर

व्याख्या- “ सरणात् सिराः । “

• द्रव द्रव्य वहन करने के कारण , उसे सिरा कहते हैं ।

• शरीर की वह सभी नालियाँ ( Tubes ) जो धातुओं का पोषण करके वहन करती हुई अपने केन्द्र स्थान ( नाभि ) हृदय तक पहुँचती हैं , उसे सिरा कहते हैं । जो शरीर के रक्त को हृदय की तरफ ले जाती हैं , उसे सिरा कहते हैं ।

• स्वरूप 

वृक्षों के पत्तों की सीवनियों के समान सिराएँ फैली हुई होती हैं । इन सिराओं का मूल स्थान नाभि है । नाभि से ये सिराएँ ऊपर , तिरछे ( आस – पास ) और नीचे की ओर फैलती हैं ।

• उत्पत्ति स्थान- ” नाभिर्मूलं ” ( सु.शा. ७/३ )

सिराओं का मूल स्थान नाभि है । प्राणियों के शरीर में जितनी सिराएँ उत्पन्न होती हैं , वे सभी नाभि से सम्बन्ध रखती हुई चारों ओर फैलती हैं । प्राणियों के प्राण नाभि में स्थित होते हैं और प्राणों पर नाभि आश्रित है ।

• संख्या- ” अपर सिरा शतानि भवन्ति । ” ( मु.शा. ७/३ )

सिराएं सात सौ होती है ।

सायां मूल सिराचारिंशत् । ” ( सु . शा . ७/५ )

 इनमें मूल सिराएं चालीस होती है ।

•  प्रकार और भेद ( शाखा – प्रशाखाओं का वर्णन )

सिराओं के चार विभाग किए गए है ।

वातवह सिराएँ 10

पितवह सिराएँ 10

कफवह सिराएँ 10

रक्तवह सिराएं 10

कुल मूल सिराएँ – 40

पुनः शाखाओं में विभक्त होकर

वातवह 175

पितवह 175 

कफवह 175

रक्तवह 175

कुल सिराएँ- 700

• सिराओं का वर्ण

वातवह – अरूण वर्ण की – वायु से भरी हुई होती हैं ।

पितवह – नील वर्ण की – उष्ण होती हैं ।

कफवह – श्वेत वर्ण की – शीत होती हैं ।

रक्तवह – रोहिणी ( रक्त वर्ण की ) – न अतिउष्ण , न अतिशीत।

•सिराओं के कार्य ( कर्म )

१. प्राकृत कर्म ,

२. वैकृत कर्म

१. वातवह सिराओं के प्राकृत कर्म- शुद्ध वायु अपनी सिराओं में अच्छी तरह से संचार करे , तो समस्त क्रियाएँ यथायोग्य होती हैं ।

वैकृत कर्म- कुपित वायु से अनेक प्रकार के वायु रोग उत्पन्न हो जाते हैं जैसे संधिशूल ( Joint pain ) , अपचन ( Indigation ) आदि ।

२. पित्तवह सिराओं के प्राकृत कर्म- शुद्ध पित्त अपनी सिराओं में संचार करे , तो अन्न में रूचि , जठराग्नि की प्रबलता , कान्ति और निरोगता आदि गुण होते हैं ।

वैकृत कर्म – कुपित पित्त से अनेक प्रकार के पित्तजन्य रोग हो जाते हैं । जैसे अम्लपित ( Acidity ) , कण्डू ( Itching ) आदि ।

३. कफवह सिराओं के प्राकृत कर्म- शुद्ध कफ अपनी सिराओं में संचार करे , तो अंगों में स्निग्धता , सन्धियों में स्थिरता , उत्साह , दृढ़ता आदि गुण उत्पन्न करता है ।

वैकृत कर्म- कुपित कफ से अनेक प्रकार के कफजन्य रोग हो जाते हैं । जैसे अरूचि ( Anorexia ) , नींद अधिक आना आदि ।

४. रक्तवह सिराओं के प्राकृत कर्म- शुद्ध रक्त सिराओं में संचार करे तो , सब घातुओं की पूर्णता और सुन्दर रूप आदि गुण होते हैं ।

वैकृत कर्म – कुपित हुआ रक्त अनेक प्रकार के रक्तजन्य रोग पैदा करता है । जैसे रक्तपित ( Gout ) , रक्तचाप का बढ़ना ( Hypertension ) आदि ।

• अवेध्य सिराएँ शरीर में कुछ ऐसी सिराएँ भी हैं , जिनके वेधन ( Puncture or cut ) होने से मृत्यु अथवा विकलता होती है ।

अधिकतर ये सिराएँ मर्मस्थानों से सम्बन्धित होती है । अत : वेधन करते समय इनका ज्ञान आवश्यक है ।

• अवेध्य सिराओं की संख्या – 98 होती है ।

षडंगों के अनुसार-

शाखाओं में- 16

मध्य शरीर में- 32

 ऊर्ध्व जत्रुगत- 50

 कुल सिराएँ 98

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