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SHASTRA KARMA VIDHI

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शास्त्रकर्मविधि भाग-1

• शोथ की चिकित्सा-

प्राय : व्रण पाक से उत्पन्न होता है और पाक से पहले शोथ ( Swelling ) होता है , अत : पहले शोथ की चिकित्सा करना चाहिये और इसे पाक ( पकने ) से बचाना चाहिये । इसके लिये अत्यन्त शीतल लेप ( Paste ) , शीतल सेक , रक्त मोक्षण ( Blood – letting ) और शोधन ( वमन – विरेचन ) आदि कराना चाहिये ।

• शस्त्र प्रयोग के पूर्वकर्म-

शस्त्र कर्म करने से पहले रोगी को ( उसका ) प्रिय भोजन खिलाना चाहिये । मद्यपान करने वाले को जो वेदना को सहन न कर सके उसे तीक्ष्ण मद्य ( Alcohal ) का पान कराना चाहिये । अन्न खिलाने से रोगी को मूर्छा ( Unconsciousness ) नहीं आती है और मद्य के सेवन से शस्त्र कर्म का ज्ञान नहीं होता है।

• अपवाद-

अन्य स्थानों में जैसे मूढगर्भ , अश्मरी ( Stones ) , मुख और उदर रोग के शस्त्र कर्म ( Surgery ) में भोजन और मद्य का सेवन नहीं कराना चाहिये ।

• शस्त्रकर्म की विधि –

चिकित्सक को शस्र कर्म के लिये सभी उपयोगी उपकरण ( Instruments ) रख लेना चाहिये , उसके पश्चात् रोगी को पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठाये और स्वयं उसके सामने होकर रोगी को नियंत्रित कर मर्मादि को बचाते हुये शीघ्रता से अनुलोम ( पूय के सीधे ) दिशा में तेजधार वाले शस्त्र को एक ही बार में पूय ( Pus ) के दिखने की गहराई में लगाना चाहिये ।

• शस्त्र कर्म के पश्चात् कर्म-

शस्त्र कर्म ( Surgery ) के बाद वाणी ( वाग्भिः ) और शीतल जल से रोगी को आश्वासन देकर व्रण को चारों ओर से अंगुलि से दबाते हैं , उसके बाद उसे कषाय से धोकर रुई ( Cotton – swab ) से वहां के जल को सुखा देते हैं । बाद में गुग्गुलु ( Eng.- Indian bedellium , LM.- Commipora mukul Engl . ) , अगुरु ( Eng.- Eagle – wood , LN. Aquilaria agallocha Roxb . ) , सरसों ( Eng.- Mustard , LN.- Brassica campestris Linn . ) , हींग ( Eng.- Asfoetida , L.N.- Ferula narthex boiss ) , सर्जस ( राल Eng.- Sal tree , L.N.- Shorea robusta gaerin , F . ) , नमक , षड्यन्था ( वच Eng .. Sweet – flag , LN.- Acorus calamus Linn . ) और नीम के पत्ते ( Eng.- Margosa leaf , LN.- Azadirachta indica A. Zuss . ) को घृत में मिलाकर व्रण पर धूप देते हैं ।

इसके बाद दोषानुसार तिल ( Eng : – Sesamum , L.N.- Sesamum indicum Linn . ) का कल्क ( Paste ) वातज व्रण में , घृत – पित्तज व्रण में और मधु से कफज व्रण में या दोषानुसार औषध से युक्त वर्ति को व्रण में रखकर उन्हीं औषधों से व्रण को ढंक देते हैं ।

इसके पश्चात् उसपर घृत मिश्रित सत्तू को रखकर उसपर मोटी कवलिका ( कपड़े का टुकड़ा ) रखकर सावधानी तथा युक्तिपूर्वक पट्टी से पार्श्व ( Latral side ) में बांध देते हैं , व्रण के उपर या नीये गांठ नहीं बांधना चाहिये ।

• पट्टी ( Bandage ) का वर्णन-

पट्टियां ( Bandages ) , कवलिकायें ( गद्दियां ) और विकेशिकायें ( वर्तियां ) पवित्र , पतली , मजबूत धूप दी हुयी , कोमल , चिकनी और वली रहित ( Without – wrinkle ) होनी चाहिये । 

• व्रण रक्षणार्थ कार्य-

शस्त्र कर्म के बाद मांस खाने वाले राक्षसों से व्रण की रक्षा के लिये राक्षसों की बलि देते हैं।

 सर्वदा लक्ष्मी ( शमी ) , गुहा ( पृश्नपी ) , अतिगुहा ( शालपर्णी ) , जटिला ( जटामांसी ) , ब्रह्मयष्टिका , वचा , सौंफ ( छत्रा ) , अतिछवा ( अजवायन ) , दूर्वा और सरसों आदि को सिर पर धारण करते हैं । इसके बाद स्नेह विधि में वर्णित आचार विधि का पालन करने को कहते हैं ।

• शस्त्र क्रिया के पश्चात् त्याज्य-

दिन में सोने से कण्डू ( Itiching ) , लालिमा , पीड़ा , शोफ ( Oedema ) और पूय ( Pus ) की उत्पत्ति होती है । स्त्रियों के स्मरण – स्पर्श या देखने मात्र से शुक्र के क्षरण हो जाने से व्यवाय के बिना भी व्यवाय से उत्पन्न दोष हो जाते हैं ( व्रण में परिश्रम ( आयास ) करने से शोथ , रात्रि जागरण से लालिमा , दोनों से पीड़ा ( रुक ) , दिन में सोने और मैथुन से मृत्यु हो सकती है )

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