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SHASTRA KARMA VIDHI

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शास्त्रकर्मविधि भाग- 2

• व्रण का प्रक्षालन-

 तीसरे दिन ( अहि ) पुन : पूर्ववत् व्रणकर्म ( कषाय से व्रण को धोकर पट्टी बदलना ) करना चाहिये । प्रक्षालनादि कार्य को दूसरे दिन नहीं करते हैं , क्योंकि इससे ( जल्दी होने के कारण व्रण में तीव्र वेदना और ग्रन्थियां उत्पन्न होने के कारण व्रण देर से भरता ( Heal होता ) है।

•  व्रण में वर्त्ति प्रयोग से लाभ-

व्रण के अन्दर वर्तिका ( विकेशिका ) को रखने से व्रण का पूतियुक्त ( सड़ा हुआ ) मांस , उत्संग ( पूय संचय से मांस का उपर उठ जाना ) , गति ( पूय से मांस के सड़ने के कारण खेखलापन होकर मार्ग बन जाना ) और पूय से भरे स्थान ( पूयगर्भिणी ) को शीघ्र ही भर देता है।

• सीने योग्य व्रण-

तुरन्त चोट लगने से मुख खुले हुये व्रण को तुरन्त सीना ( Suturing ) चाहिये । मेदज ग्रन्थियों में व्रणों को और कान की छोटी पालियों ( Ear – lobes ) को भी लेखन ( Scraping ) कर सीना चाहिये । शिर , अक्षिकूट ( नेत्र गोलक ) , नासिका , ओष्ठ , गण्ड , कर्ण , उरु ( Thigh ) , बाहु , ग्रीवा , ललाट ( Forehead ) , मुष्क ( अण्डकोष- Serotum ) , नितम्ब ( Hips ) , मेड़ ( Penis ) , पायु ( Anus ) और उदर आदि गम्भीर प्रदेश , मांसल और अचल स्थानों के व्रण को सीना चाहिये ।

• सीने के अयोग्य व्रण-

 वंक्षण ( Inguinal region ) , कक्षा ( Axila ) , अल्प मांस वाले और गतिशील स्थान के व्रण को नहीं सीना चाहिये । जिस व्रण से वायु निकलती हो , जिसमें शल्य हो , क्षार ( Alkali ) विष या अग्नि से ( जलने ) से उत्पन्न व्रण को भी नहीं सीना चाहिये ।

• सीने के पश्चात् कर्म-

व्रण को सीने के पश्चात् रोगी को सान्त्वना देकर व्रण में मधु और घृत में अञ्जन ( स्रोतोञ्जन ) , अलसी की राख , प्रियंगु ( L.N.- Callicarpa macrophylla Vahl ) , शल्लकी फल ( L.N.- Boswellia serrata Roxb . ) , रोध्र ( L.N. Symplocos racemosa Roxb . ) और मधुक ( मधुयष्टी Eng . – Liquorice , L.N.- Glycyrrhiza glabra Linn ) का चूर्ण मिलाकर लगाते हैं , और बाद में पहले की ही भांति पट्टी ( Bandage ) बांध देते हैं।

• व्रण बन्धन-

देशादि का विचार कर ( वीक्ष्य ) बन्धन आदि का प्रयोग करना चाहिये । आविक ( भेड ) , अजिन ( हिरण ) और रेशम ( कौशेय ) उष्ण होता है किन्तु क्षौम ( अलसी ) शीतल होता है । सेमल की रुई के सूत से बना या कपास – स्नायु या वल्कल शीतोष्ण होता है ।

ताम्र ( Copper ) , अयस ( लौह ) , त्रपु ( रांगा ) और सीसा ( Lead ) को मेद और कफ की अधिकता वाले व्रण में प्रयोग में लाते है । भग्न ( Fracture ) में फलक ( पट्टिका ) , चर्म , वल्कल और कुशादि ( बांस की खपच्ची ) को प्रयोग में लाते हैं ।

• बन्धन के भेद-

बन्ध ( पट्टियां- Bandages ) पन्द्रह प्रकार के होते हैं , इनके नाम के अनुसार ही इनका आकार होता है । ( १ ) कोश ( २ ) स्वस्तिक , ( ३ ) मुत्तोली , ( ४ ) चीन , ( ५ ) दाम , ( ६ ) अनुवेल्लित , ( ७ ) खट्वा , ( ८ ) विबन्ध , ( ९ ) स्थगिका , ( १० ) वितान , ( ११ ) उत्सङ्ग , ( १२ ) गोष्फण , ( १३ ) यमक , ( १४ ) मण्डल और ( १५ ) पंचांगी , इन्हें स्थान के अनुसार प्रयोग में लाते हैं ।

• इनमें से कोश बन्य को अंगुलि के पर्व में , स्वस्तिक को कान , कक्षा ( Axila ) आदि , स्तनों और सन्धियों में , मुत्तोली को मेढ़ ( Penis ) और ग्रीवा आदि में , चीन को अपाङ्ग ( नेत्र ) में , दाम को सम्बाध अंग में जहां आसानी से पट्टी न बंध सके , अनुवेल्लित को शाखाओं में , खट्वा को हनु ( Jaws ) , गण्ड और शंख ( Temporal ) प्रदेश में , विबन्ध को पीठ और उदर में , स्थगिका को अंगुष्ठ , उंगली , मेढ़ ( Penis ) के अग्र भाग और अन्त्रवृद्धि ( Hernia ) में वितान को चौड़े अंग और शिर में , उत्संग को लटकने वाले बाहु आदि में ( विलम्बिनी ) , गोष्फण को नासा , ओष्ठ , चिबुक ( Chin ) और सन्धियों में , यमक बन्य यमक ( दो ) व्रणों में , मण्डलबन्ध गोल अंग में और पंचांगी बन्ध को जत्रु ( Clavicle ) के उपर के भाग में बांधना चाहिये ।

बुद्धिमान चिकित्सक को चाहिये कि जो बन्ध ( Bandage ) जहां उचित हो उसे वहीं पर प्रयुक्त करे ।

• बन्धन का निषेध-

कुष्ठ रोगियों के व्रण , अग्नि से जले व्रण , मधुमेह रोगियों की पीटिकायें , मूषक विष से उत्पन्न कर्णिका के आकार की मांस वृद्धि , क्षार ( Alkali ) से जले व्रण , विषैले व्रण , मांसपाक के व्रण , दारुण गुद पाक से उत्पन्न व्रण , सड़न उत्पन्न हुये व्रण , वेदना और दाहयुक्त व्रण , शोथयुक्त और फैलने वाले ( विसर्पिणः ) व्रण में बन्धन नहीं करना चाहिये ।

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