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SANDHI SHARIR

by

संधि शारीर भाग 2

स्नायु वर्णन

स्नायु शरीरगत श्वेत सूत्रमय ( White fibrous of plexus ) उपधातु हैं , जो सन्धि और माँसपेशी के बन्धन में काम आते हैं ।

स्नायु का स्वरूप सूत्रमय होता है , जो सन्धिबन्धन में सहायक होते हैं , एवं सीवन ( Suture ) के कार्य में भी काम आते हैं ।

स्थान भेद से आकार के अनुसार इन्हें Tendon , fibrous tissue , liga I ment , aponeurosis , valvular band of muscles भी कहा जाता है ।

• स्नायु संख्या

 स्नायु की कुल संख्या 900 है ।

जिसमें शाखाओं में 600 स्नायु  है

मध्य शरीर में 230

ऊर्ध्वजत्रुगत या ग्रीवा के ऊपर 70 स्नायु है ।

• स्नायु प्रकार- स्नायु चार प्रकार के होते हैं

१. प्रतानवती स्नायु

२. वृत्त स्नायु

३. पृथुल स्नायु 

४. शुषिर स्नायु

• स्नायु के स्थान

१. प्रतानवती स्नायु ( Ligament ) – शाखाओं में तथा सन्धियों में होती हैं । प्रतान के समान लम्बी होती हैं ।

२. वृत्त स्नायु ( Tendon )- गोल कण्डराओं को वृत्त स्नायु कहते हैं । ये भी शाखा और सन्धियों में होती हैं ।

३. पृथुल स्नायु- ( Flattened or ribbon shaped tendon or aponeurosis ) पार्श्व ( Side ) , उर : ( Chest ) तथा पृष्ठ ( Back ) और शिर ( Skull ) में पृथुल ( चपटी ) स्नायुएँ होती हैं ।

४. शुषिर स्नायु ( Sphinctors or valvular band of muscles or covering of peritonium ) आमाशय ( Stomach ) , पक्वाशय ( Intestine ) तथा बस्ति ( Urinary blad der ) में शुषिर ( Hollow ) स्नायु होते हैं ।

•  स्नायु के कार्य

१. स्नायुओं के जाल मांसपेशियों में फैले रहते हैं , जिनसे इनकी संकोच ( Flexion ) एवं प्रसारण ( Extension ) की क्रिया में सुविधा बनी रहती है ।

२. स्नायुओं को आचार्य सुश्रुत ने व्रणाध्याय में सीवन ( Suture ) के लिए उपयुक्त बताया है ।

३. स्नायु बन्धन से ही हमारा शरीर दृढ़ ( मजबूत- Strong ) रहता है ।

४. स्नायु के आधार पर शरीर भारी वजन ( Heavy weight ) उठाने में समर्थ होता है ।

५. शरीर के प्रत्येक भाग को एक दूसरे से जोड़ने में स्नायु सहायक होते हैं ।

६. स्थान , आकार आदि के भेद से शरीर के प्रत्येक भाग से होने वाले कार्यों में सहायक होते हैं ।

• स्नायु का महत्व

“ न ह्यस्थीनि न वा पेश्यो न सिरा न च सन्धयः ।

व्यापादितास्तथा हन्युर्युथा स्नायुः शरीरिणाम् ।। ” ( सु.शा. ५/४३ )

• पीड़ित ( Injured ) हुई स्नायु जितनी व्याकुलता ( Severe pain ) उत्पन्न करती है , उतनी पीड़ा ( Pain ) अस्थि , पेशियों , सिरा और सन्धियों पर आघात होने से भी नहीं होती ।

१. सभी स्नायु शरीर में मांस , अस्थि और सन्धियों के बन्धन हैं ।

२. ये बन्धन बहुत मजबूत होते हैं ।

३. सभी सन्धियाँ स्नायुओं द्वारा बन्धी होने से भार वहन करने में समर्थ होती हैं ।

४. स्नायुओं द्वारा ही अस्थि में घुमाव ( Rotation ) हो सकता है ।

५. स्नायुओं के पीड़ित स्थान में बहुत पीड़ा ( Pain ) होती है । जैसे- शरीर के जिस अंग में मोच ( Sprain ) आ जाती है , वहाँ पर महिनों तक पीड़ा ( Pain ) होती है । और कभी – कभी तो वह अंग काम करना ही कम कर देता है । ( Loss of function )

अत : स्नायु का- अस्थि , सन्धि , पेशी आदि की अपेक्षा विशेष महत्व है

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