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षड्विरचेनशताश्रितीय अध्याय

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अध्याय 4. षड्विरचेनशताश्रितीय अध्याय

आयुर्वेद शास्त्र में 600 विरेचन योग है। जिसमें से वमन योग संख्या 355 है तथा विरेचन योग संख्या 245 है।
• इस अध्याय में विरेचन का अर्थ वमन तथा विरेचन दोनों से लिया गया है।

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वमन योग- 355

मदन फल – 133
जीमूतक – 39
इक्ष्वाकु – 45
धामार्गव – 60
वत्सक -18
कृतवेधन – 60

• विरेचन योग – 245

श्यामा त्रिवृत – 110
चतुरंगुल – 12
तिल्वक – 16
स्नुही – 20
सप्तला शंखिनी – 39
दंती द्रवंती – 48

• विरेचन द्रव्यों के आधार या आश्रय
१.क्षीर २.मूल ३.त्वक ४.पत्र ५.पुष्प ६.फल

कषाय की 5 योनियाँ


१. मधुर २.अम्ल ३.तिक्त ४.कटु ५.कषाय
• कषाय की 5 योनियों में लवण रस को शामिल नहीं किया गया है क्योंकि मधुर आदि रसों की तरह लवण रस का प्रयोग अकेले नहीं किया जाता । और दूसरा कारण यह है कि जो औषध द्रव्यों की पांच प्रकार की कल्पनाएं कहीं गई है वह भी लवण में संभव नहीं है क्योंकि न उसका स्वरस निचौड़ा जा सकता है और न उसकी अलग से चटनी पीसी जा सकती है न तो चूर्ण बनाने पर उसके गुण में कोई विशेषता आती है इसलिए वह अपने आप ही गल जाता है।

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