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स्वप्न

स्वप्नावस्था के सम्बन्ध में निद्रा प्रकरण में बता आये हैं कि जागृत अवस्था में हम जो कुछ सुनते हैं अथवा देखते हैं उनके प्रभाव से मन में जो वासनायें उठती हैं उनके प्रपंच स्वप्नों के रूप में प्रकट होते हैं ।

स्वप्न अविद्या [ अप्रभा , अयथार्थ ज्ञान ] के अन्तर्गत आते हैं ।

“तत्राविद्या चतुर्विधा संशयविपर्ययानध्यवसायस्वप्नलक्षणा ।।”

गुणग्रन्थ अविद्या के चार भेद होते हैं – संशय , विपर्यय , अनध्यवसाय [ indeterminate knowledge ] तथा स्वप्न ।

• स्वप्नोत्पत्ति-
जो मनुष्य पूर्ण निद्रा में न हो वह इन्दियों के अधिष्ठाता व प्रेरक मन द्वारा फलयुक्त अथवा फलरहित अनेक प्रकार के स्वप्न देखता है ।

जागृत अथवा सुषुप्ति अवस्थाओं में स्वप्न नहीं आते हैं क्योंकि मन जागृत अवस्था में सत्त्वगुणप्रधान रहता है तथा सुषुप्ति अवस्था में तमोगुणप्रधान रहता है । इन दोनों के मध्य की अवस्था में , जिसमें तमोगुण प्रधान रहता है परन्तु रजोगुण भी प्रभावशाली हो जाता है । स्वप्न आया करते हैं ।

फलभेद से दो प्रकार के स्वप्न कहे गए हैं ।
1.वे स्वप्न जिनका अर्थ होता है । अतः उनका फल होता है । उन्हें फलयुक्त स्वप्न कहते हैं तथा
2.वे स्वप्न जिनका कोई अर्थ नहीं होता । वे फलरहित होते हैं ।

• स्वप्न के प्रकार

स्वप्न सात प्रकार के होते हैं -1 . दृष्ट , 2. श्रुत , 3. अनुभूत , 4. प्रार्थित , 5. कल्पित , 6.भाविक तथा 7. दोषज ।

1 . दृष्टस्वप्न- जाग्रदवस्था में जिन घटनाओं का हम नेत्रों द्वारा प्रत्यक्षीकरण कर चुके हैं उन्हीं वस्तुओं अथवा घटनाओं को पुनः स्वप्न में देखें तो वे स्वप्न दृष्टस्वप्न हैं ।

2 . श्रुतस्वप्न – जिन बातों को जाग्रदवस्था में सुन चुके हैं उन्हीं को पुनः स्वप्न में सुनें तो वे स्वप्न श्रुतस्वप्न कहलाते हैं ।

3 . अनुभूतस्वप्न – जो घटनायें अन्य इन्द्रियों से अनुभूत हैं उन्हें स्वप्न में भी अनुभव करें तो वे स्वप्न अनुभूतस्वप्न कहलाते हैं ।

4 . प्रार्थितस्वप्न – जिस वस्तु की इच्छा हो उसे स्वप्न में प्राप्त करें ऐसे स्वप्न प्रार्थितस्वप्न हैं ।

5 . कल्पितस्वप्न – जिनकी पूर्व कल्पना की जा चुकी हो उस कल्पना को स्वप्न में साकार देखें तो वे स्वप्न कल्पितस्वप्न की कोटि के हैं ।

6 . भाविकस्वप्न- भविष्य में होने वाली शुभ अथवा अशुभ घटनाओं का पूर्वाभास स्वरूप स्वप्न भाविकस्वप्न हैं ।

7 . दोषजस्वप्न- दोषज व्यक्तियों द्वारा होने वाले स्वप्न दोषजस्वप्न कहलाते हैं ।

• शुभ स्वप्न

स्वप्न में राजमहल , पर्वत , बैल , घोड़े और पुरुषों की सवारी करना । समुद्रों तथा नदियों को तैरकर पार कर जाना । प्रसन्न हुए देवता तथा पित्तरों से वार्तालाप करना , चन्द्रमा , सूर्य , अग्नि , ब्राह्मण , गौ , यशस्वी पुरुष , श्वेत वस्त्रादि एवं निर्मल तालाब आदि देखना ।

मांस , मछली , विष , अपवित्र [ मल आदि ] , छत्र , दर्पण इनकी प्राप्ति । श्वेत पुरुषों , शुभ स्थानों के दर्शन , यान की सवारी , पूर्व अथवा उत्तर की ओर गमन करना , गिरे हुए को उठाना , शत्रुओं को पराजित करना ये सब शुभ स्वप्नों के लक्षण हैं ।

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