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SASTRA VIDHI

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शस्त्रविधि भाग 1

• छब्बीस प्रकार के शस्त्र-

अच्छे कारीगरों ( सु + कारैः घटितानि ) द्वारा विधि पूर्वक बनाये हुये शस्त्र छब्बीस ( २६ ) प्रकार के होते हैं , रोग को काटने वाले शस्त्र अधिकतर छ : ( ६ ) अंगुल के , देखने में अच्छे रूप वाले , अच्छे धार वाले , पकड़ने में अच्छे और कार्य करने वाले होने चाहिये ।

ये देखने में भयानक न हो , अच्छी प्रकार से तप्त ( आध्मात ) किये गये हों और अतितीक्ष्ण लोहे ( ऽयसि ) से बनाये हुये होने चाहिये । इन ( शस्त्रों ) के मुख आगे से अच्छी तरह से मिलने वाले हों और इनकी छवी ( आभा ) नीले कमल के समान होना चाहिये ये नाम के अनुकूल रूप वाले और सदैव पास में ( सन्निहितानि ) रक्खे होने चाहिये ।

प्रत्येक शस्त्र अपने प्रमाण ( लम्बाई – चौड़ाई ) के १/२ या १/४ भाग फल ( Blade ) वाले एक – एक , दो या तीन को मिलाकर स्थान के आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाना चाहिये ।

• ( १ ) मण्डलाय , ( २ ) वृद्धिपत्र , ( ३ ) उत्पल , ( ४ ) अध्यर्द्धधारक , ( ५ ) सर्पफण , ( ६ ) एषणी , ( ७ ) वेतस , ( ८ ) शरीरमुख , ( ९ ) त्रिकूर्चक , ( १० ) कुशा , ( ११ ) साटवदन , ( १२ ) अन्तर्वक्त्रार्धचन्द्र , ( १३ ) ब्रीहिमुख , ( १४ ) कुठारी , ( १५ ) शलाका , ( १६ ) अङ्गुलिशस्त्रक , ( १७ ) बडिश , ( १८ ) करपत्र , ( १ ९ ) कर्तरी ( २० ) नखशस्त्र , ( २१ ) दन्तलेखन , ( २२ ) सूची ( २३ ) कूर्च , ( २४ ) खज , ( २५ ) आरा- चार प्रकार की और ( २६ ) कर्णवेधन- ये छब्बीस ( २६ ) प्रकार के शस्त्र है ।

• मण्डलाग्र शस्त्र-

मंगलाय शस्त्र का फल ( Blade ) तर्जनी अंगुलि ( Index Finger ) और अन्तर्नख के आकार का होता है पोथकी ( Trachoma ) और शुण्डिका आदि में लेखन ( Scraping ) और छेदन के लिये प्रयोग में लाते हैं ।

• बृद्धिपत्र शस्त्र-

यह छूरे ( उस्तरा ) के आकार का होता है और छेदन – भेदन ( Excision – Incision ) तथा पाटन ( चीरने Tearing ) के कार्य में प्रयुक्त होता है । उन्नत ( Concave ) और गम्भीर शोफ ( Swelling ) में वृद्धिपत्र शस्त्र को आगे से और कम गहरे तथा नीचे के शोफ में पीछे से आगे को झुका रखना चाहिये और स्थान के अनुसार लम्बा या छोटा ( भेदन- Incision ) लगाना चाहिये ।

• उत्पल और अध्यर्द्धधार शस्त्र-

‘ उत्पल ‘ और ‘ अय॑द्धधार ‘ शस्त्र भेदन ( Incision ) और छेदन ( Excision ) के कार्य में प्रयुक्त होता है।

• सर्पवक्त्र शस्त्र-

 इसका प्रयोग नाक और कर्ण के अर्श को काटने के काम में होता है , इसका फल ( Blade ) आधा अंगुल होता है ।

• एषणी शस्त्र-

यह ढूंढने ( व्रण का मार्ग ) के कार्य में प्रयुक्त की जाती है , यह चिकना ( Smooth ) और गण्डूपद ( केचुए Earthworm ) के मुख के आकार का होता है ।

भेदन के लिये दूसरी सूई के मुख के समान ( नुकीली- Pointed ) और जड़ में छेद वाली होती है ( क्षार सूत्र में इसका प्रयोग करते हैं ।

•  वेतस शस्त्र-

यह ( पत्राकार होता है ) वेधन ( Puncturing ) के लिये प्रयुक्त किया जाता है ।

• शरारिमुख और त्रिकूर्चक शस्त्र-

 ये शस्त्र रक्त स्रावण ( Blood letting ) में प्रयुक्त किये जाते हैं । कुश और आटीमुख शस्त्र भी स्रावण ( रक्तस्राव ) में प्रयुक्त होता है , इनका फल ( Blade ) दो अंगुल का होता है ।

• अन्तर्मुख शस्त्र उसके ( कुशपत्र और आटीमुख के ) समान होता है इसका फल ( Blade ) डेढ़ अंगुल या अर्धचन्द्राकार होता है ।

• व्रीहीवक्त्र शस्त्र-

इस शास्त्र का फल ( Blade ) डेढ़ अंगुल होता है । इसका प्रयोग शिर और उदर ( Abdomen ) के वेधन ( Puncturing ) में होता है ।

• कुठारी शस्त्र-

यह चिपटा ( पृथु ) , गाय के दांत के समान और मुख पर आधा अंगुल का होता है । इसके उपरी भाग पर दण्डा होता है जिसे पकड़कर अस्थियों ( Bones ) के उपर स्थित या अस्थियों में स्थित शिरा का वेधन ( Puneturing ) करते हैं ।

• ताम्री द्विमुखी शलाका-

ताम्र ( Copper ) की बनी दो मुख वाली शलाका ( Rod ) जो मुख पर कुरुबक ( मोगरा के आकार की होती है , इससे लिंगनाश ( Cotract ) का वेधन ( Puncturing ) करते हैं ।

• अंगुलि शस्त्र –

मुद्रिका ( Ring ) में से निकला मुख – फल ( Blade ) आधा अंगुल बड़ा , रूप में मण्डलाग्न या वृद्धिपत्र जैसा होता है । मुद्रिका ( Ring ) ऐसी होनी चाहिये जिसे तर्जनी अंगुलि ( Index finger ) के अगले पर्व ( Node ) में पहना जा सके । इस मुद्रिका को धागे ( सूत्र ) से बांध ( हस्त के मणिबन्ध- Wrist ) देते हैं और गले के स्रोतों के रोगों के छेदन ( Excision ) और भेदन ( Incision ) में इसको प्रयोग में लाते हैं ।

• बडिश शस्त्र-

यह आगे से अच्छी प्रकार से झुका हुआ ( सुनत आननम् ) होता है , इसका प्रयोग शुण्डिका ( Vulva ) और अर्म आदि पकड़ने में करते हैं ।

• करपत्र शस्त्र-

इसका प्रयोग अस्थियों ( Bones ) को छेदने में किया जाता है , इसकी धार कर्कश ( खर ) , लम्बाई दश अंगुल और चौड़ाई दो अंगुल , छोटे दांत वाला तथा अच्छी मुठ्ठी ( पकड़ने ) वाले बन्धन से जुड़ा होता है ( इसे आरी कहते हैं  )।

• कर्तरी शस्त्र-

यह कर्तरी ( कैंची- Scissors ) के समान होती है , जो स्नायु ( Tendons ) , सूत्र ( धागा ) और केश काटने में प्रयुक्त होता है ।

• नख शस्त्र-

इसकी एक धार टेढ़ी और एक सीधी होती है , ये दो मुख वाला और नव ( ९ ) अंगुल लम्बा होता है इसका प्रयोग सूक्ष्म शल्य ( Foreign body ) को निकालने , छेदन ( Excision ) , भेदन ( Incision ) , प्रच्छन ( पाछना- Scraching ) और लेखन ( Scraping ) में करते हैं । 

• दन्तलेखन शस्त्र-

यह एक धार का , चार कोने वाला और एक पार्श्व में बड़ा होता है । इस दन्तलेखन शस्त्र से दन्तशर्करा का शोधन करते हैं ।

• सूची शस्त्र-

सूइयां ( Needls ) जो गोल , धागा डालने के स्थान पर गूढ़ ( गहरी ) और दृढ़ होती हैं , तीन प्रकार की- ह्रस्व , मध्यम और दीर्घ होती हैं , ये सिलाई करने के काम आती हैं ।

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