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SARIROPAKRAMA

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शारीरोपक्रम

शारीरोपक्रम का अर्थ होता है- शरीर के सम्बन्ध में सम्पूर्ण विवरण ।

शरीर की व्याख्या

" शुक्र शोणितं जीव संयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भ संज्ञा भवति । "( च.शा. ४/५ )

पुरुष शुक्र ( spermatozoa ) और स्त्री शोणित ( ovum ) इनका स्त्री के गर्भाशय ( कुक्षि , uterus ) में संयोग होने पर जब जीवात्मा प्रवेश करती है , तब ही मनुष्य शरीर के अंकुर की उत्पत्ति होती है । और उसे गर्भ ( Embryo ) की संज्ञा दी जाती है ।

आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार संसार में उपलब्ध सभी पदार्थ , सभी वस्तुएँ , सभी प्राणी पंचमहाभूतों द्वारा निर्मित हुए हैं । इसलिए मनुष्य के गर्भ की निर्मिति भी पांचभौतिक ही होती है ।
“ तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चमहाभूतविकार समुदायात्मकं समयोगवाहि । ” ( च.शा. ६/४ )

चेतना ( आत्मा ) का अधिष्ठान और पंचमहाभूत रुपी विकारों का समुदाय शरीर कहलाता है । यह शरीर समयोगवाही होता है , अर्थात् सप्तधातु , तीन दोष एवं मलों समावस्था में रहने पर ही गति करता है ।

” दोषधातुमल मूलं हि शरीरम् । ” ( सु.सू. १५/३ )

दोष – धातु तथा मल ही शरीर के मूल कारण हैं । तीन दोष , सप्त धातुएँ और तीन मल ये प्राकृतावस्था में शरीर का धारण करते हैं , इसलिए इन तेरह तत्वों के समूह को शरीर कहते हैं ।

" शीर्यतेऽनेन् इति शरीरम् । "

प्रतिपल क्षीण अथवा नष्ट होते रहने के कारण ही इसे शरीर कहते हैं । शरीर शब्द का अर्थ है- टूटना । जिसमें टूट – फूट चलती रहती है , उसे शरीर कहते हैं ।

•शारीर की व्याख्या

शरीरं अधिकृत्य कृतो ग्रन्थः शारीरः । ” ( अरुणदत्त )

शरीर को आधार मानकर लिखे गए ग्रन्थ को शारीर कहते हैं

” शरीरं अधिकृत्य कृतं तन्त्रं शारीरम् । “
शरीर को आधार मानकर उसी के सम्बन्ध में सम्पूर्ण ज्ञान जिस तन्त्र में या शास्त्र में वर्णित है , उसे शारीर कहते हैं ।

शरीरि का अर्थ है- आत्मा ।

•शारीर ज्ञान का प्रयोजन

व्याधि ( Disease ) होने पर उस शरीर को व्याधि से मुक्त करना तथा स्वस्थ शरीर को स्वस्थ ही बनाए रखना , यह आयुर्वेद का प्रयोजन है ।
अत : शरीर में उत्पन्न हुई व्याधियों ( Diseases ) की चिकित्सा ( Treatment ) करने के लिए उस शरीर की प्राकृत रचनाओं ( Normal structures ) का तथा क्रियाओं ( Normal functions ) का सर्वप्रथम उत्पन्न होना आवश्यक है ।
तब ही शरीर के प्रत्यंगों ( organs ) में हुई विकृति , उनके स्थान , कार्य आदि की प्राकृत तथा विकृत अवस्थाएँ , स्थानानुसार होने वाले लक्षण , इन सभी को जानने के लिए शरीर की स्थूल तथा सूक्ष्म रचनाओं और उनकी क्रियाओं का सम्यक् ज्ञान होना आवश्यक हो जाता है । यह ज्ञान प्राप्त कराना शारीर ज्ञान का प्रयोजन है।

•षडङ्ग शारीर या शरीर का षडङ्गत्व

मानव शरीर का अध्ययन करने के लिए उसके छ : विभाग किए गए हैं । इसी को षडंग शरीर कहा जाता है ।

” तच्च षडङ्ग – शाखाश्चतस्त्रो , मध्यं पञ्चम , षष्ठं शिर इति । ” ( सु.शा. ५/३ )
” द्वौ बाहू , द्वे सक्थिनी , शिरोग्रीवम् , अन्तराधिः , इति षडङ्गमङ्गम् । ” ( च.शा. ७/५ )
” शिरोऽन्तराधिः द्वौ बाहू सक्थिनीति समासतः । ” ( अ.ह.शा. ३/१ )
शरीर के छः विभाग
१. दक्षिण ऊर्ध्वशाखा (Right upper extremity )
२. वाम ऊर्ध्वशाखा (Left upper extremity )
३. दक्षिण अध : शाखा (Right lower extremity)
४. वाम अध : शाखा (Left lower extremity)
५. अन्तराधि या मध्य शरीर- (Trunk ( Thorax and abdomen ) )
६. शिर और ग्रीवा (Head and neck)

•शारीर शास्त्र के विभाग

मानव शरीर के छ : विभाग एवं अनेक उपविभाग व अंग – प्रत्यंग हैं । उन अंगों की रचना एवं क्रिया सम्बन्धी ज्ञान के लिए शारीर शास्त्र को दो भागों में विभक्त किया है –
१. रचना शारीर
२. क्रिया शारीर

१. रचना शारीर

" रचनाप्रतिपादकं शारीरं रचनाशारीरम् । "

जिस विज्ञान के अन्तर्गत शरीर के अवयवों की रचना ( Structure ) के सम्बन्ध में अध्ययन किया जाता है , उसे रचना शारीर ( Anatomy ) कहा जाता है ।

२. क्रिया शारीर

” क्रिया प्रतिपादकं शारीरं क्रिया शारीरम् । “

जिस विज्ञान के अन्तर्गत शरीर के अवयवों की क्रिया ( Function ) के सम्बन्ध में अध्ययन किया जाता है , उसे क्रिया शारीर कहते हैं ।

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