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SANGYA PRAKARAN

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संज्ञा प्रकरण भाग -2

संज्ञा सूत्र

• संज्ञा अर्थात नाम देना।

१. इत्संज्ञा

हलन्त्यम् १/३/३ ।।

उपदेश अवस्था में अन्त में होने वाला व्यञ्जन इत् होता है । अर्थात् उपदेश अवस्था में जो अन्त्य हल उसकी इत्संज्ञा होती है ।
पाणिनि , कात्यायन एवं पतञ्जलि ने जिसका प्रथम उच्चारण या प्रथम पाठ किया उसे उपदेश कहा जाता है । जैसे चौदह माहेश्वर सूत्रों का प्रथम बार उच्चारण किया गया अत : इनको उपदेश कहा जाता है ।

सूत्रार्थ के अनुसार इनमें जो अन्त्य व्यञ्जन ‘ हल् ‘ होगा उसकी इत्संज्ञा होगी । जैसे अ इ उ ण् में ण् वर्ण अन्त्य है , ऋ ल क् में क् वर्ण अन्त्य है । अत : ये सभी इत्संज्ञक वर्ण कहलाते हैं और इत्संज्ञा होने से ” तस्य लोपः ‘ १ / ३ / ९ ।। इस सूत्र से उसका लोप हो जाता है ।

२. लोपसञ्ज्ञा

अदर्शनं लोप : १/१/६० ।।

पहले विद्यमान का बाद में अदर्शन होना लोप कहलाता है । अदर्शन अर्थात् जो न दिखे , जो न सुनाई पड़े । जो पहले था किन्तु बाद में किसी सूत्र आदि के द्वारा उसका लोप हो जाय तो वह न सुनने का न ही दिखने का विषय बनता है किन्तु उसका नाश नहीं होता । जैसे- हर इह- हरियह ।

३. लोपविधायक सूत्रम्

तस्य लोपः १ / ३ / ९ ।।

अर्थात् ‘ हलन्त्यम् , उपदेशेऽजनुनासिक इत् ‘ इत्यादि सूत्रों से जिसकी इत्संज्ञा होती है उसका लोप होता है । तात्पर्य यह है कि इत्संज्ञा का फल लोप है । अतएव इत्संज्ञक वर्ण का श्रवण उच्चारण नहीं होता ।
जैसे – अ इ उण् इत्यादि चौदह सूत्रों के अन्त्य ण् आदि इत्संज्ञक वर्ण है । इत्संज्ञक वर्ण का लोप.इस सूत्र से होता है ।

४. प्रत्याहारसंज्ञा

आदिरन्त्येन सहेता १/१/७१ ।।

अन्त्य इत्संज्ञक वर्ण से युक्त आदि वर्ण बीच के वर्णो की और अपनी भी संज्ञा का बोधक होता है । जैसे ‘ अण् ‘ यह ‘ अ इ उ ‘ इन वर्गों की संज्ञा बोधक है । इसी प्रकार अच् , अल् , हल् इत्यादि संज्ञायें भी होती है ।

‘ आदिरन्त्येन सहेता ‘ इस सूत्र से प्रत्याहारों की सिद्धि होती है । अण् आदि प्रत्याहार संज्ञा ही है । इसी सूत्र के द्वारा चौदह माहेश्वर सूत्रों से ४२ प्रत्याहार बनते हैं , इसी प्रकार इसी सूत्र से सु , औ , जस् आदि प्रत्ययों को लेकर सुप् प्रत्याहार ओर तिप् , तस् , झि आदि को लेकर तिङ् प्रत्याहार भी बनाये जाते हैं ।

५. ह्रस्वसंज्ञा , दीर्घसंज्ञा और प्लुतसंज्ञा

ऊकालोऽज्झस्वदीर्घप्लुतः १/२/२७ ।।

उकालोऽज्झस्वदीर्घप्लुतः- एक मात्रिक , द्विमात्रिक और निमात्रिक जो उकार हैं , उसके उच्चारण में जितना समय लगता है , उसी प्रकार उतना ही समय जिस किसी अच् के उच्चारण में लगे उसे क्रमशः एक मात्रिक की हस्व , द्विमात्रिक की दीर्घ तथा त्रिमात्रिक की प्लुत संज्ञा होती है । जैसे- उ , ऊ , ऊ

६. उदात्तसंज्ञासूत्रम्

उच्चैरूदात्त : १ / २ / २ ९ ।।

उच्चैरुदात्त : – कण्ठ तालु आदि स्थानों के ऊपरी भाग से जिस स्वर की उत्पत्ति होती है , उसको उदात्त कहते है अर्थात् मुख सहित तालु , कण्ठ आदि स्थानों के ऊर्ध्व भाग से उच्चारण किया जाने वाला अच् उदात्त संज्ञक होता है ।

७. अनुदात्तसंज्ञा

नीचैरनुदात्त : १/२/३० ॥

नीच्चैरनुदात्त : – कण्ठ तालु आदि स्थानों के नीचे के भाग से जिस स्वर की उत्पत्ति होती है उसे अनुदात्त कहते हैं अर्थात् मुख सहित तालु , कण्ठ आदि स्थानों के अधो भाग से उच्चारण किया जाने वाला अच् उदात्त संज्ञक होता है ।

८. स्वरित संज्ञा

समाहारः स्वरितः १/२/३१ ।।

समाहारस्वरित : – उदात्त व अनुदात्त दोनो धर्मो का मेल जिन वर्गों में होता है , वह स्वरित कहलाता है अर्थात् तालु आदि स्थानों में मध्य भाग से जिस स्वर की उत्पत्ति होती है , उसे स्वरित कहते है ।

९ . अनुनासिक संज्ञा

मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः १/१/८ ।।

मुख सहित नासिका से उच्चारित होने वाले वर्णो की अनुनासिक संज्ञा होती है । वर्गों का उच्चारण तो मुख से होता है किन्तु ङ , ञ , ण , न म् आदि वर्ण और अनुनासिक तथा अनुस्वार के उच्चारण में नाक की भी सहायता चाहिए । ङ् , ञ् , ण् , न् , म् और य्ँ , व्ँ , ल्ँ भी अनुनासिक माने जाते हैं और य् , व् , ल् के रूप में निरनुनासिक भी हैं ।

१०. सवर्णसंज्ञा

तुल्यास्यप्रयतं सवर्णम् १ / १ / ९ ।।

तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्- तालु आदि स्थान और आभ्यन्तर प्रयत्न ये दोनो जिस वर्ण के समान हों , वे वर्ण आपस में सवर्ण संज्ञा वाले होते हैं । जैसे- च और द । प्रयत्न दो प्रकार का होता है आभ्यन्तर और ब्राह्म ।

११. संहितासज्ञा

परः सन्निकर्षः संहिता १/४/१०१ ।।

पर : सन्निकर्षः संहिता- वर्गों की अत्यन्त समीपता की संहिता संज्ञा होती है । जैसे- सुधी+ उपास्य : -सुध्युपास्यः । अत : संहिता कहने पर सभी सन्धि कार्य आदि होते हैं ।

१२. संयोगसंज्ञा

हलोऽनन्तराः संयोगः १/१/७ ।।

हलोऽनन्तरा संयोगः- जिन व्यञ्जनों के बीच में कोई स्वर न हो वे परस्पर एक हो जाते हैं । इस क्रिया का नाम संयोग है । जैसे- सु द् ध् य् + उपास्यः ।

१३. पदसंज्ञा

सुप्तिङन्तं पदम् १/१/१४ ।।

सुप्तिङन्तं पदम्- सुबन्त प्रत्यय राम आदि शब्दों और तिङ्न्त भू आदि धातु की पद संज्ञा होती है ।

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