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SANEHVIDHIM ADHYAY

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स्नेहविधिमध्याय

• “गुरुशीतसरस्निग्घमन्दसूक्ष्ममृदुद्रवम् ।

औषधं स्नेहनं प्रायो , विपरीतं विरूक्षणम् ।।१ ।।”

 स्नेह और विरूक्षण द्रव्य-

गुरू , शीत , सर ( फैलने वाले ) , स्निग्ध , मन्द , सूक्ष्म और द्रव औषध प्राय : स्नेहन करने वाले होते हैं । इनसे विपरीत लक्षणों या गुणों वाले द्रव्य रूक्षता ( विरूक्षण ) लाने वाले होते हैं ।

• महास्नेह-

घृत , मज्जा ( Bone Marrow ) , वसा ( Fat ) और तैल ये स्नेहों में उत्तम ( प्रवर ) माने गये है । इन स्नेहों में भी घृत ( सर्पि ) सर्वोत्तम हैं क्योंकि यह संस्कार को ग्रहण ( अनुवर्तन ) करता है ।

मधुर , अविदाही ( जलन रहित ) और जन्म से ही ( दुग्ध के रूप में ) इस ( घृत ) का सेवन करने के कारण यह सभी स्नेहों में उत्तम माना गया है ।

• स्नेह के योग्य-

जिनका स्वेदन करना हो , जिनका संशोधन ( वमन , विरेचन , आस्थापन वस्ति , अनुवासन वस्ति और शिरोविरेचन ) करना हो , मद्य – स्त्री प्रसंग – व्यायाम में आसक्त ( लगे हुये ) , चिन्ता करने वाले , वृद्ध , बालक , दुर्बल ( अवल ) , कृश ( दुबला – पतला ) , रूक्ष , क्षीण रक्त , क्षीण शुक्र वाला , वात से पीड़ित ( वातार्त ) , अभिष्यन्द ( नेत्र ) रोगी , तिमिर ( नेत्र के सामने अंधेरा छाना , और वर्मरोगी ( जिसकी पलकें कठिनाई से खुलती हो ) ये स्नेहन करने के योग्य हैं अर्थात् इनका स्नेहन करना चाहिये ।

• स्नेहन के अयोग्य-

अतिमन्दानि , अतितीक्ष्णाग्नि , अतिस्थूल , अतिदुर्बल , उरूस्तम्भ ( उरू प्रदेश में स्तब्धता- Stifness in Thigh ) , अतिसार , आम , गले का रोग , गर ( कृत्रिम ) विष , उदर रोग , मूर्छा ( Unconsicousness ) , छर्दि ( Vomiting ) , अरूचि , कफ , तृष्णा , मद्य से पीड़ित , अपप्रसूता ( जिसका गर्भस्राव या गर्भपात हो गया हो ) और जिसे नस्य ( शिरोविरेचन ) वस्ति और विरेचन कर्म कराया गया हो उन्हें स्नेहन नहीं कराना चाहिये ।

• स्नेह देने के प्रकार-

 युक्तिपूर्वक ( मात्रा , काल , क्रिया , देश , देह , दोष और प्रकृति इन सबका भलीभांति ) विचार कर भक्ष्यादि ( भक्ष्य , भोज्य , लेह्य और पेय ) अन्न के साथ , वस्तियों ( निरूह , अनुवासन और उत्तर वस्ति ) के द्वारा , नस्य ( शिरोविरेचन ) , अभ्यङ्ग ( मालिश ) , गण्डूष , मूर्धा , ( सिर ) , कर्ण और अक्षि ( नेत्र ) के तर्पण द्वारा शरीर में स्नेह का सेवन ( अवचारण ) कराना चाहिये ।

• अच्छपेया-

अच्छ ( शुद्ध ) स्नेह जिसका पान किया जाता है उसमें किसी की प्रकार की विचारणा ( कुछ मिलाया नहीं जाता हैं ) नहीं की जाती है । स्नेह का यह कल्प ( प्रयोग ) श्रेष्ठ होता है । क्योंकि यह शीघ्र ही अपने कर्म ( तर्पण ) मार्दव आदि को करता है ।

• अच्छपान की विधि-

मृदु कोष्ठ वाले व्यक्ति को तीन दिन तक अच्छ स्नेह का पान कराते है और क्रूरकोष्ठ में सात दिन तक अच्छ स्नेह का पान कराते है अथवा जब तक सम्यक् रूप से स्नेहन न हो जाये तब तक स्नेह पान कराना चाहिये । इसके बाद स्नेह सात्म्य ( शरीर के अनुकूल ) हो जाता है।

• सद्यः स्नेह- बालक , वृद्ध और स्नेह का पालन ( परिहार ) न कर सकने वाले व्यक्ति को उद्दीप्त न करने वाले एवं तुरन्त स्नेहन करने वाले और उद्वेग न उत्पन्न करने वाले योगों का सेवन करना चाहिये ।

• सात स्नेहन योग- ( १ ) अत्यधिक मात्रा में मांस से निर्मित मांस रस , ( २ ) मांसरस में बनी और स्नेह में भुनी पेया ( ३ ) घृत आदि स्नेह और गुड़ के राब के साथ तिल का चूर्ण ( ४ ) घृत और राब के साथ कृशरा ( ५ ) अत्यधिक घृत और दुग्ध में बनी उष्ण पेया , ( ६ ) गुड़ के साथ दही की मलाई और ( ७ ) पञ्च प्रसृति ( 465 gm ) पेया – घृत तैल , वसा मज्जा में एक – एक प्रसृति ( २-२ पल ) और चावल एक प्रसूति ( 93 gm ) । ये सात योग शीघ्र ( सद्यः ) स्नेहन करने वाले हैं और लवण की अधिकता ( उल्बणाः ) वाले स्नेह भी शीघ्र स्नेहन करते है क्योंकि लवण अभिष्यन्दि ( स्रोतों का अवरोध ) करने वाला , अरूक्ष , सूक्ष्म , ( स्रोतों में प्रविष्ट होने वाला ) , उष्ण और व्यवायि ( पहले सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है उसके बाद पचता ( Digest ) होता है ।

• स्नेहपान का परिणाम-

स्नेह का नित्य सेवन करने वाले व्यक्ति की अन्तराग्नि ( जठराग्नि ) दीप्त रहती है , कोष्ठ साफ रहता है , सदा नये रस – रक्तादि धातु उत्पन्न होते रहते हैं , व्यक्ति बल और वर्ण से युक्त रहता है , सभी इन्द्रियाँ ( ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ ) दृढ़ ( शक्तिशाली ) रहती है , जरा ( वृद्धावस्था ) विलम्ब से आता है , और सौ वर्ष तक जीवित रहता है ।

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