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SANDHI SHARIR

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• संधि शारीर भाग 1

सन्धि शब्द का अर्थ है- मेल या संगम ।

” अस्थि संयोग स्थानम् । “

अस्थि संयोग स्थान को सन्धि कहा जाता है ।

जब दो या दो से अधिक अस्थियों के किनारे आपस में जहाँ मिलते हैं , उस मेल या संयोग को सन्धि कहते हैं ।

जो सिराओं और धमनियों द्वारा रक्त संचार एवं पोषण करती हैं । तथा इन अस्थियों को गति देने में भी सहायता प्रदान करती हैं । ये सभी अस्थियाँ जिस – जिस स्थान पर मिली हुई हों , उन स्थानों को अस्थिसन्धि कहा जाता है ।

• सन्धियों की विविधता

शरीर में एक समान वस्तुओं के मेल को सन्धि कहते हैं । जैसे- अस्थियों का मेल अस्थिसन्धि , सिराओं का मेल – सिरासन्धि , पेशियों का मेल – पेशीसन्धि आदि ।

आयुर्वेद ग्रन्थों में केवल अस्थिसन्धियों के वर्णन में लिखा है , कि ये सभी अस्थिसन्धियाँ हैं ,

• सन्धियों की संख्या

आचार्य सुश्रुत ने अस्थिसन्धियों की संख्या 210 बताई है ।

• सन्धियों के प्रकार एवं भेद

” सन्धयस्तु द्विविधाश्चेष्टावन्तः , स्थिराश्चा ” ( सु.शा. ५/२६ ) शाखासु हन्वोः कट्यां च चेष्टावन्तस्तु सन्धयः ।

 शेषास्तु सन्धयः सर्वे विज्ञेया हि स्थिरा बुधैः ।। ( सु.शा. ५/२७ )

सन्धियों के प्रकार और उनके स्थान सन्धियाँ दो प्रकार की होती हैं- चल और स्थिर ।

शाखा , हनु और कटि में चेष्टायुक्त ( चल ) सन्धियाँ होती हैं । शेष सन्धियाँ स्थिर होती हैं ।

• सन्धियों के रचनानुसार आठ भेद

कोर – उलूखल – सामुद्ग – प्रतर – तुनसेवनी – वायसतुण्ड – मण्डल – शंखावर्त।

• सन्धियों के कार्य

दो या दो से अधिक अस्थियों की जो सन्धियाँ शरीर में हैं , उनसे शरीर के प्रत्यंगों में गति ( Movement ) कराने की क्रियाएँ होती हैं ।

जिससे मनुष्य चलना , घूमना , उठना , बैठना , खड़ा होना , सोना , दौड़ना , हाथ हिलाना , भोजन करना आदि सब क्रियाएँ कर सकता है ।

इनमें भी कुछ अस्थियों की सन्धियाँ स्थिर या अचल होती हैं , उनमें गति नहीं होती । जैसे- शिर : कपालों की सन्धि ।

• बुद्धिमान चिकित्सक को इन चारों उपायों के द्वारा सभी चल और अचल सन्धियों को यथास्थान स्थापित करना चाहिए ।  १. आच्छन- खींचना

२. पीडन –  नीचे – ऊपर दबाना

३. संक्षेप- सिकोड़ना

४. बन्धन –  बाँधना।

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