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SANDHI PRAKARANA PART -2

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अध्याय 2 संधि प्रकरण • भाग -२

•व्यंजन संधि

हल् अर्थात् व्यञ्जनों में होने वाली सन्धि। कहीं हल से हल् परे और कहीं पूर्व में हल् किन्तु पर में अच् हो तो भी होने वाली सन्धि हत्सन्धि या व्यञ्जन सन्धि कहलाती है ।

१. श्चुत्वसन्धिः

स्तोः श्चुना श्चुः ८/४/४० ॥

१. सकार और तवर्ग ( त , थ , द , ध , न ) के साथ यदि श और चवर्ग ( च , छ , जद झ , न ) हो तो शकार और चवर्ग ( च , छ , ज , झ , न ) हो जाता है ।
पूर्व पद के अन्त में- स् त् थ् द् ध् न्
उत्तर पद के आदि में -श् च्छ् ज् झ् ञ् – श् च् छ् ज् झ् ल्

उदाहरण

रामस्+ चिनोति = रामश्विनोति ।
रामस् + शेते = रामश्शेते ।

२.ष्टुत्वसन्धिः

ष्टुना ष्टुः ८/४/४१ ।।

पूर्व पद के अन्त में यदि स अथवा तवर्ग ( त , थ , द , ध , न ) का कोई व्यञ्जन हो और उत्तर पद के आदि में ष् हो अथवा टवर्ग ( ट , ठ , ड , ढ , ण ) का व्यञ्जन हो तो उनके स्थान पर प और टवर्ग ( ट , ठ , ड , ढ , ण ) हो जाता है ।

उदाहरण
रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः ।
कृष्णस् + टीकते = कृष्णष्टीकते ।।

३. पदान्त जश्त्व सन्धि

झलां जशोऽन्ते ८ / ३ / ३ ९ ।।

यदि पूर्व पद के अन्त में कोई झल् प्रत्याहार ( वर्ग के प्रथम , द्वितीय , तृतीय , चतुर्थ ) और ऊष्म वर्ण ( श , ष , स , ह ) हों तो उनके स्थान पर जश् ( ज ब ग ड द ) हो जाता है । ( जश् वर्ण अर्थात् तृतीय वर्ण हो जाता है ) ।

उदाहरण
वाक् + ईशः = वागीशः ।
अच् + अन्त : = अजन्तः ।

४. अपदान्तजश्त्व सन्धि

झलां जश् झशि ८/४/५३ ।।

पूर्व पद में स्थित झल् वर्ग के प्रथम , द्वितीय , तृतीय , चतुर्थ और ऊष्म वर्ण ( स , श , ष , ह ) हों तो उनको जश् अर्थात् अपने वर्ग का तृतीय वर्ण ( ग ज ड द ब ) हो जाता है यह सन्धि पद के बीच में होती है ।

उदाहरण
लभ् + धा = लब्धा ।
सिध् + धिः = सिद्धिः ।

•विसर्गसन्धिः

व्यञ्जनों तथा विभिन्न स्वरों के योग से विसर्गो का परिवर्तन श् , ष् , स् , र् , ह् , य् लोप के रूप में होता है।

स् के रूप में- ” विसर्जनीयस्य सः ८/३/३४ ।।

यदि विसर्गों के आगे प्रत्येक वर्ण के ( प्रथम , द्वितीय , त , थ , श , ष , स , ह ) वर्ण हों तो विसर्गों को स् हो जाता है ।

उदाहरण
विष्णुः + त्राता – विष्णोस्त्राता ।
यशः + काम्यति = यशस्काम्यति ।

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