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SANDHI PRAKARANA PART -1

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संधि प्रकरण • भाग -१

•सन्धि का मुख्य अर्थ है – जोड़ना । व्याकरण के नियमों के अनुसार स्वर , व्यञ्जन तथा विसर्गों के विकारयुक्त मेल को सन्धि कहते हैं सु – आगतम् स्वागतम् ।

•सन्धि के तीन भेद हैं १. स्वर सन्धि । २. व्यञ्जन सन्धि । ३. विसर्ग सन्धि ।

•स्वरसन्धिः

१. स्वर्णदीर्घसन्धिः

अकः सवर्णे दीर्घः ६ / १ / १०१ ।।

जब अ इ उ ऋ लू के बाद में ये ही स्वर , हस्व या दीर्घ रूप में हों तो दोनो के स्थान पर तदनुरूप दीर्घ हो जाता है ।

उदाहरण
गण + अधिपतिः = गणाधिपतिः ।
सती + ईश : = सतीशः ।

२. गुणसन्धिः

आद्गुणः ६/१/८७ ।।

यदि अ या आ के बाद ऋ य ऋ हो तो दोनो के स्थान पर अर आदेश हो जाता है । लू आता है तो अल् आदेश हो जाता है । इ , ई हो तो ए आदेश हो जाता है । उ , क हो तो ओ आदेश हो जाता है ।
उदाहरण
गण + ईशः = गणेशः ।
सर्व+ उदय : = सर्वोदयः ।

३. वृद्धिसन्धिः

वृद्धिरेचि ६/१/८८ ॥

यदि पूर्व पद के अन्त में अ या आ और उत्तर पद के आदि में ए , ऐ , ओ , औ हो तो ए.ऐ के स्थान पर ऐ आदेश हो जाता है तथा ओ , औ के स्थान पर औ आदेश हो जाता है । ए , ऐ – ऐ , ओ , औ- औ ।

उदाहरण
देव + ऐश्वर्यम् = देवैश्वर्यम् ।
कृष्ण + ऐकत्वम् = कृष्णैकत्वम्।

४. यण् – सन्धिः

इको यणचि ६/१/७७ ।।

इक् के स्थान पर यण् होता है , अच् प्रत्याहार के परे होने पर ।
अर्थात् जब पूर्व पद के अन्त में इ या ई के बाद उन्हीं स्वरों को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो इ , ई , के स्थान पर य् हो जाता है ।
यदि पूर्व पद के अन्त में उ या ऊ हो तो उसके बाद उन्हीं स्वरों को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो उ , या ऊ के स्थान पर व् हो जाता है ।
जब लृ के बाद लृ को छोड़कर अन्य स्वर हो तो लृ के स्थान पर ल् आदेश हो जाता है ।

उदाहरण
सुधी + उपास्ये = सुध्युपास्यः।
मधु + अरिः = मध्वरिः ।

५.अयादिसन्धिः

एचोऽयवायाव : ६/१/७८ ।।

एच के स्थान पर क्रम से अय् , अव् , आय , आव् से आदेश होते हैं अच् के परे होने पर । यह अयादि आदेश विधान करने वाला विधिसूत्र है ।
एच् ( ए , ओ , ऐ , औ ) के बाद जब उत्तर पद के आदि में कोई स्वर आता है तो इनके स्थान पर क्रमश : अय् , अव्, आय् , आव् आदेश होता है ।

उदाहरण
हरे + ए = हरये ।
विष्णो + ए = विष्णवे ।

६.पूर्वरूपसन्धिः

एङः पदान्तादति ६ / १ / १० ९ ।।

पदान्त एङ् से हस्व अकार के परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश होता है ।

पूर्व पद के अन्त में यदि ए या ओ हो और उत्तर पद के आदि में हत्व अ हो तो वह ए या ओ का रूप धारण कर लेता है । पूर्वरूप होने पर अ का चिन्ह ( ऽ ) होता है ।

उदाहरण
हरे + अव = हरेऽव ।
विष्णो + अव = विष्णोऽव ।

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