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SAMVAY VIGYANIYA

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समवाय – विज्ञानीय

कोई भी वस्तु किसी वस्तु के साथ बिना किसी सम्बन्ध के नहीं रह सकती ।

वैशेषिकों के अनुसार यह सम्बन्ध दो प्रकार का होता है –
१ . संयोग और
२. समवाय संबन्ध ।

१. संयोग सम्बन्ध – उन दो या अधिक वस्तुओं में होता है , जो संयोग ( Combination ) के बिना भी अपनी पृथक् सत्ता ( Individual identity ) धारण कर सकता है । यह सम्बन्ध अनित्य ( Temporary ) होता है । यह कुछ समय या क्षण तक ही अपनी सत्ता बनाये रख सकता है ।

अन्तत : यह कहा जा सकता है कि दो या दो से अधिक वस्तुओं के कतिपय क्षण या स्थायी वाह्य सम्बन्ध को संयोग कहते हैं ।

२. समवाय सम्बन्ध – यह संयोग सम्बन्ध से पूर्णतया भिन्न है । यह दो वस्तुओं में रहने वाला नित्य सम्बन्ध ( Eternal relation ) है ।
आचार्य चरक के मतानुसार भूमि आदि आधार द्रव्यों के साथ गुर्वादि आधेय गुणों । अपृथग्भाव ( अलग न रहने का ) सम्बन्ध हैं उसे ही समवाय कहते हैं ।

समवाय की उपयोगिता ( Applied aspects of Samvaya ) –

औषधियों ( द्रव्यों ) में पाये जाने वाले गुण समवाय सम्बन्ध से द्रव्यों में रहते हैं , अत : इनके अनुसार ही इनका प्रयोग – स्वास्थ्य संरक्षणार्थ और रोग निराकरणार्थ ( स्पष्ट करने के लिये ) प्रयोग करते हैं ।

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