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SAMANYA VIGYANIYA

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सामान्य विज्ञानीय

सामान्य ( Common ) और विशेष ( Different or uncommon ) दोनों पृथक् – पृथक् पदार्थ हैं , जो विरूद्ध गुणों और कार्यों वाले हैं , परन्तु शास्त्रकारों ने जहां भी वर्णन किया है दोनों का एक साथ ही वर्णन किया है ।

यह वर्णन यहां तक किया है कि यदि एक श्लोक के आधे भाग में ‘ सामान्य ‘ का वर्णन है तो दूसरे आधे भाग में ‘ विशेष का वर्णन किया है । दोनों की यथेष्ट व्याख्या की दृष्टि से सर्वप्रथम ‘ सामान्य पदार्थ ‘ का वर्णन किया जा रहा है

सामान्य निरूपण

आचार्य चरक ने कहा है कि सामान्य सर्वदा सभी भावों की वृद्धि करने वाला होता है , भाव शब्द से द्रव्य , गुण और कर्म को लिया गया है । सामान्य एकत्व करने वाला होता है ।
तात्पर्य यह है कि सामान्य वह पदार्थ है , जो अनेक पदार्थों में एकत्व स्थापित कर उसकी वृद्धि करता है ।
जैसे भिन्न – भिन्न देश और समय में अनेक ‘ गौ ‘ को देखकर सभी ये कहते हैं कि यह गौ है । इस प्रकार एकता की बुद्धि उत्पन्न कराने वाले पदार्थ को सामान्य कहते हैं।

सामान्य के भेद –
आचार्यों ने इसके २ भेद किये हैं —
१ . पर सामान्य और
२ . अपर सामान्य ।

१. पर सामान्य – सबसे अधिक व्यापक और व्यक्तियों में रहने वाली जाति को ‘ पर सामान्य ‘ कहा गया है ।
जैसे – द्रव्य , गुण और कर्म इन तीनों में पदार्थत्व जाति पर सामान्य है , इसे सत्ता भी कहते हैं , क्योंकि इसके अन्तर्गत अन्य सभी सामान्य आ जाते हैं , उदाहरणत : द्रव्यत्व और घटत्व आदि ।

२. अपर सामान्य – सबसे कम व्यापकता या व्यक्तियों में रहने वाली जाति को ‘ अपर सामान्य ‘ कहते हैं ।
जैसे – घटत्व केवल घड़े तक ही सीमित है ।

‘ पर ‘ और ‘ अपर ‘ के बीच वाले सामान्य को ‘ परापर सामान्य ‘ कहते हैं ।

द्रव्य , गुण और कर्म भेद से सामान्य पुन : तीन प्रकार के वर्णित हैं ।
१. द्रव्य सामान्य – जिन द्रव्यों में समानता होती है , वे द्रव्य अपने समान द्रव्य की वृद्धि करते हैं ।
‘ सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धि कारणम् ‘ इसे आचार्य चरक ने द्रव्य का लक्षण माना है , जैसे – मांस सेवन से मांस की वृद्धि होना , रक्त सेवन से रक्त की वृद्धि होना आदि ।

२. गुण ( Quality ) सामान्य – यह सामान्य एकत्व ( Uniformity ) उत्पन्न करने वाला होता है – ‘ सामान्यमेकत्वकरम् ‘ , अर्थात् समान गुण वाले द्रव्य के सेवन से समान गुण की वृद्धि होती है ।
उदाहरणत : – दुग्ध एवं घृत के सेवन से शुक्र की वृद्धि होती है । शुक्र गुण में मधुर , शीत और स्निग्ध होता है , घृत और दुग्ध भी समान गुण धर्मी होते हैं , अत : ऐसे गुणों वाले सभी द्रव्य शुक्र की वृद्धि करते हैं।

३. कर्म ( Action ) सामान्य – दोषों को बढ़ाने वाले यदि कार्य किये जायें तो इसे कर्म सामान्य कहते हैं , जैसे – बैठे रहने या दिवास्वाप ( दिन में सोना ) से कफ की वृद्धि होती है , दौड़ने या व्यायाम करने से कफ का क्षय और वात की वृद्धि होती है आदि कार्य । अत : इसके लिये ‘ तुल्यार्थता हि सामान्यम् ‘ कहा है।

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