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ROGANUTPADNIYA ADHYAY

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रोगानुत्पादनीयाध्याय भाग -1

“वेगान्न धारयेद्वातविण्मूत्रक्षवतृट्क्षुधाम् ।

निद्राकासश्नमश्वासजृम्भाऽ श्रुच्छदिरेतसाम् ।।१ ।।”

• तेरह अधारणीय वेग-

बुद्धिमान् व्यक्ति को उपस्थित हुये- ( १ ) वात , ( २ ) विण ( मल ) , ( ३ ) मूत्र , ( ४ ) क्षव ( छीक Sneezing ) , ( ५ ) तृट् ( प्यास- Thirst ) , ( ६ ) क्षुधा ( भूख ) , ( ७ ) निद्रा , ( ८ ) कास ( खांसी- Cough ) , ( ९ ) श्रम ( थकान Fatigue ) से उत्पन्न श्वास ( Dyspnoea ) , ( १० ) जृम्भा ( जंभाई- Yawning ) , ( ११ ) अश्रु ( Tear ) , ( १२ ) छर्दि ( वमन Vomiting ) और ( १३ ) रेतस् ( शुक- Semen ) इन ( तेरह प्रकार के ) वेगों को जो बाहर निकलने वाले हैं , नहीं रोकना चाहिये ।

• अधोवात वेगावरोध से उत्पन्न रोग-

अधोवात ( अपान वायु ) का वेग रोकने से गुल्म ( Abdominal tumour due to gaseous distension ) , उदावर्त ‘ , रुक् ( कोष्ठशूल- Abdominal pain ) , क्लम ( बिना श्रम के थकान होना ) , वात ( अपान वायु ) , मूत्र और शकृत् सङ्ग ( मूत्र और मल का अवरोध ) , दृष्टि और अग्नि बध ( दृष्टि और अग्नि का नष्ट होना ) और हृदय के रोग होते हैं ।

• वातवेगावरोध से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा-

वात के वेग को रोकने से होने वाले रोग में स्नेहन ( Oleation ) और स्वेदन ( Fomentation ) चिकित्सा विधि करना चाहिये , फलवर्तियां ( Suppositories ) , वात नाशक भोजन , उष्ण जल का पान , वस्ति कर्म ( Enema ) और वात का अनुलोमन ( उचित मार्ग से निकालना- Descending series ) करने वाले कार्य करना चाहिये ।

• मल वेगावरोध ( Defecation ) से उत्पन्न रोग-

मल के वेग को रोकने से पिण्डिकोद्वेष्टन ( पिण्डलियों में ऐंठन के समान पीड़ा- Cramps in the calf muscles ) , प्रतिश्याय ( Cold ) , शिरोरुज ( शिर में वेदना- Headache ) , वायु का ऊपर की ओर जाना , परिकर्तिका ( गुदा में कैंची से काटने जैसी पीड़ा ) , हृदय का उपरोध ( हृदय गति में अवरोध ) , मुख से मल का आना और पूर्व में वर्णित वात वेगावरोध से उत्पन्न व्याधि – गुल्म , उदावर्त आदि रोग होते हैं ।

• मूत्रवेगावरोध ( Micturition ) से उत्पन्न रोग-

मूत्र के उपस्थित वेग को रोकने से अङ्गों का टूटना ( Malaise ) , अश्मरी ( Stones ) , वस्ति ( Urinary bladder ) , मेढ़ ( शिश्न- Penis ) और वंक्षण ( Inguinal reason ) में वेदना होती है । प्राय : पूर्व के वात और मल के वेगधारण से होने वाले रोग भी होते हैं।

• मूत्रवेगावरोध से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा-

इनकी ( वात , मल और मूत्र के वेगावरोध से उत्पन्न रोगों की ) चिकित्सा फलवर्ति ( वर्ति ) , अभ्यंग ( Massage ) , अवगाहन ( Tub – bath ) , स्वेदन ( Fomentation ) और बस्ति ( Enema ) कर्म से कराते हैं ।

• मलावरोध ( Defecation ) से उत्पन्न रोग की चिकित्सा- मलावरोध से उत्पन्न रोगों में चिकित्सा के लिये विशेष रूप से विड्भेदी ( मल का भेदन- Stool breaking करने वाले ) अन्न – पान देना चाहिये ।

• मूत्रावरोध ( Retension of urine ) से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा- इसमें भोजन से पूर्व ( प्रारभक्तं ) घृत ( गोघृत ) का पान कराना चाहिये और रात्रि का भोजन जीर्ण ( जीर्णान्तिकं ) हो जाने अर्थात् पच ( Digest ) जाने पर उत्तम मात्रा में घृतपान कराना चाहिये , इन दोनों योजनाओं की अवपीडक संज्ञा है , अर्थात् इन्हें अवपीडक कहते हैं।

• उद्गार ( Belching ) अवरोध से रोगोत्पत्ति-

उद्गार ( उर्ध्ववात ) को रोकने से अरुचि ( भोजन में रुचि का न होना Anorexia ) , कम्प ( शरीर का कांपना – Tremor ) , हृदय और उर : प्रदेश ( Chest ) में अवरोध , आध्मान ( पेट में तनाव Tympanitis ) , कास ( खांसी- Cough ) , और हिध्या ( हिचकी- Hiccough ) की उत्पत्ति होती है । इसमें हिक्का रोग के समान औषध देना ( चिकित्सा करना ) चाहिये ।

• छींक ( Sneezing ) वेगावरोध से उत्पन्न रोग-

छींक का वेग रोकने से शिरोऽर्ति ( शिर में शूल- Headache ) , इन्द्रियों की दुर्बलता , मन्यास्तम्भ ( Torticollis ) और अर्दित ( Facial paralysis ) रोग की उत्पत्ति होती है । इसकी चिकित्सा के लिये तीक्ष्ण धूमपान ( Smoking ) , तीक्ष्ण अञ्जन , तीक्ष्ण घ्राण ( नस्य- Nasal medication ) , नावन और सूर्य ( अर्क ) की ओर देख कर ये सब करना ( छींकना ) चाहिये तथा स्नेहन और स्वेदन ( Fomentation ) भी करना चाहिये

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