fbpx

ROGANUTPADNIYA ADHYAY

by

रोगानुत्पादनीयाध्याय भाग -2

• प्यास ( Thirst ) वेगावरोध से उत्पन्न रोग-

प्यास का वेग रोकने से मुख का सूखना , अङ्गों में शिथिलता , बाधिर्य ( Deafness ) , सम्मोह ( ज्ञान का अभाव- Fainting ) , भ्रम ( चक्कर आना- Giddiness ) और हृदय के रोग होते हैं । इसमें सम्पूर्ण रूप से शीतल विधि ( उपाय ) का सेवन करना चाहिये ।

• भूख ( Hunger ) के वेग को रोकने से उत्पन्न रोग और चिकित्सा-

इससे अंगों का टूटना ( Bodyache ) , अरुचि ( Distaste ) , ग्लानि ( Depression ) , कृशता ( Emaciation ) , वेदना और भ्रम ( चक्कर आना- Giddiness ) के लक्षण होते हैं । इसमें लघु ( Light ) , स्निग्ध ( Unctous ) , उष्ण और अल्प ( कम ) मात्रा में भोजन करना चाहिये ।

• निद्रा ( Sleep ) वेगावरोध से उत्पन्न रोग और चिकित्सा-

इसके वेग को रोकने से मोह ( मूर्छा- Fainting ) , मूर्धा ( शिर ) और अक्षि ( चक्षु ) में गुरुता , आलस्य , जृम्भिका ( जम्भाई का आना- Yawning ) और अङ्गमर्द ( Bodyache ) के लक्षण होते हैं । इसमें ठीक से सोना और संवाहन ( मर्दन- Massage ) करना चाहिये ।

• कास ( Cough ) के वेग के अवरोध से उत्पन्न रोग-

इससे कास ( खांसी – Cough ) की वृद्धि , श्वास ( Dyspnoea ) , अरुचि ( Distaste ) और हृदय के रोग ( आमय ) होते हैं । शोष ( Emaciation ) और हिध्मा ( हिक्का – Hiccough ) की उत्पत्ति होती है , इसमें कास नाशक विधि को पूर्ण रूप से करना चाहिये । 

•श्रमश्वास ( Dyspnoea ) के वेगावरोध से उत्पन्न रोग-

श्रम से उत्पन्न श्वास को रोकने से गुल्म ( Tumour ) , हृदय रोग और सम्मोह ( मूर्छा- Fainting ) की उत्पत्ति होती है । इस में विश्राम ( Rest ) और वातनाशक कार्य ( आहार – विहार ) करना चाहिये ।

• जृम्भा ( Yawning ) के वेगावरोध से उत्पन्न रोग और चिकित्सा-

इससे क्षव ( छींक – Sneezing ) को रोकने के समान रोग होते हैं , अत : इसकी चिकित्सा के लिये पूर्णरूप से वातनाशक विधि को अपनाना चाहिये । 

• अश्रु ( Tear ) वेगावरोध से उत्पन्न रोग और चिकित्सा-

वाष्प ( अश्रु ) के वेग को रोकने से पीनस ( प्रतिश्याय- Catarrh ) . अक्षि ( नेत्र ) -शिरो – हृदयरोग , मन्यास्तम्भ ( Torticolis ) , अरुचि ( Distaste ) , भ्रम ( चक्कर- Giddiness ) और गुल्म ( Tumor ) रोग की उत्पत्ति होती है । निद्रा लेना , मद्य ( Alcohal ) और अच्छी कथायें सुनना चाहिये ।

• वमन ( Vomiting ) के वेगावरोध से उत्पन्न रोग-

इससे विसर्प ( Erysipelas ) , कोठ ( त्वचा पर रक्त वर्णन का कठिन मण्डल- Urticaria ) . कुष्ठ ( Skin diseases ) , नेत्र रोग , कण्डु ( Itching ) , पाण्डु ( Anaemia ) रोग ( आमय ) , ज्वर ( Fever ) , कास ( खांसी- Cough ) , श्वास ( Dyspnoea ) , हृल्लास ( मिचली- Nausea ) , व्यङ्ग ( Black – pigmentation of skin ) और श्वयवु ( शोथ- Oedema ) के लक्षण उत्पन्न होते हैं ।

• वमन वेगावरोध से उत्पन्न रोग की चिकित्सा-

इसमें गण्डूष ‘ ( मुख में क्वाथ या द्रव का इतनी मात्रा में भरना जिससे मुख में इसे घुमाया न जा सके ) , धूमपान ( Smoking ) , अनाहार ( उपवास- Fasting ) , रूक्ष अन्न सेवन कर उसी का वमन करना , व्यायाम ( Exercise ) , रक्तमोक्षण ( Blood letting ) और विरेचन कराना चाहिये । अभ्यंग ( Massage ) के लिये यवक्षार और लवणयुक्त तैल उत्तम है ।

• शुक्र ( Semen ) के वेगावरोध से उत्पन्न रोग-

शुक्र का स्त्राव ( Seminal discharge ) , गुह्य वेदना ( लिङ्ग- Penis और वृषण- Testies में वेदना ) , श्वयथु ( शोथ- Oedema ) , ज्वर ( Fever ) , हृदय में पीड़ा , मूत्रसंग ( मूत्र का अवरोध ) , अंगभग ( Bodyache ) , वृद्धि ( अण्डवृद्धि ) , अश्मरी ( Stones ) और नपुंसकता ( Impotency ) के लक्षण होते हैं ।

• शुक्र वेगावरोध से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा-

इसमें ताम्रचूड ( मुर्गा ) का मांस , सुरा ( Alcohal ) , शालि चावल , बस्ति ( Enema ) , अभ्यङ्ग ( Massage ) और अवगाहन ( Tub – bath ) का सेवन करना चाहिये । बस्ति को शुद्ध करने वाले द्रव्यों ( कूष्मांड , यवक्षार आदि ) से सिद्ध दुग्ध का पान करे और प्रिय स्त्रियों के साथ रहना चाहिये

Leave a Comment

error: Content is protected !!