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ROGANUTPADANIYA ADHYAY

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रोगानुत्पादनीयाध्याय भाग-3

“धारयेत्तु सदा वेगान् हितैषी प्रेत्य चेह च ।

लोभेद्विषमात्सर्यरागादीनां जितेन्द्रियः ।। २४ ।।”

धारणीय वेग-

इहलोक और परलोक में हित चाहने वाले व्यक्ति को जितेन्द्रिय ( ज्ञानेन्द्रिय + कर्मेन्द्रिय -५ + मन = ११ इन्द्रियों को जीतकर ) होकर लोभ ( लालच ) , ईर्ष्या , द्वेष , मात्सर्य ( दूसरे के प्रसन्नता से ईर्ष्या होना ) और राग ( प्रेम ) आदि वेगों को रोकना चाहिये ।

• मलों का शोधन- समयानुसार मलों का शोधन करते रहना चाहिये । क्योंकि अत्यधिक मात्रा में संचित होने पर ये क्रुद्ध होकर जीवन ( आयु ) को नष्ट कर सकते हैं ।

• संशोधन चिकित्सा का महत्त्व- लंघन और पाचन के द्वारा जीते गये अर्थात् शान्त किये गये दोष कभी कुपित हो सकते है किन्तु संशोधन ( पंचकर्म – वमन , विरेचन , वस्ति ( निरुह ) , वस्ति ( अनुवासन ) और शिरोविरेचन ) के द्वारा बाहर कर दिये ( शुद्ध किये ) गये दोष पुन : कुपित नहीं होते हैं ।

• शोधन के पश्चात् रसायन- संशोधन के बाद काल के ज्ञाता चिकित्सक को चाहिये कि क्रम और योग के अनुसार सिद्ध रसायनों और वृष्य ( बृंहण कारक ) योगों का सेवन करे।

• पथ्यादि का सेवन-

जो व्यक्ति औषध के कारण क्षीण ( क्षपिते ) हुआ हो इसे क्रम से आहार द्वारा बृंहणकारक पथ्य देना चाहिये । आहार में शालि चावल , साठी चावल ( Eng.- Rice , L.N. – Oryza sativa Linn . ) , गोधूम ( गेहूँ , Eng : – Wheat , LN . – Triticum sativum Lam . ) , मूंग ( Eng : – Green gram L.N.- Phaseolus aureus Roxb ) , मांस और घृत आदि आहार तथा हृदय के लिये लाभकारक , अग्नि दीपक औषधि के संयोग से बनाया आहार जो रुचिकारक और पाचन ( पक्तिदैः ) कराने में समर्थ हो इनका क्रमश : सेवन कराना चाहिये ।

• “ये भूतविषवाय्वग्निक्षतभङ्गादिसम्भवाः ।

रागद्वेषभयाद्याश्च ते स्युरागन्तवो गदाः ।।३१ ।।”

आगन्तुक रोग-

जो भूत , विष , वायु , अग्नि , क्षत ( चोट लगने ) और भङ्ग ( टूटने ) आदि से उत्पन्न होते हैं तथा राग ( प्रेम ) , द्वेष ( ईर्ष्या ) और भय आदि से उत्पन्न होते हैं , उन रोगों ( गदाः ) को आगन्तुक रोग कहते हैं ।।

• निज और आगन्तुक रोगों की चिकित्सा –

प्रज्ञापराध का त्याग , इन्द्रियों की शान्ति , स्मृति , देश – काल और आत्मा का ज्ञान , सद्बत् का पालन ( अनुवर्तन ) , अथर्ववेद के अनुसार शान्ति , प्रतिकूल ( विपरीत ) ग्रहों की पूजा ( अर्चनम् ) , भूतादि के स्पर्श से बचने की वर्णित पृथक् – पृथक् विधि निज और आगन्तुक विकारों ( रोगों ) को उत्पन्न न होने देने के लिये और यदि रोग उत्पन्न हो गये हों तो उनकी शान्ति के लिये संक्षेप में यह विधि वर्णित कर दी गयी है।

• दोषों का शोधन काल-

शीत ( हेमन्त- मार्गशीर्ष + पौष – विसर्ग काल का अन्त – श्रेष्ठ बल + शिशिर- माघ फाल्गुन – आदान काल का प्रारम्भ- श्रेष्ठ बल ) में संचित दोष ( कफ ) को बसन्त ( चैत्र + वैशाख – आदान काल का मध्य – मध्य बल ) में ,

ग्रीष्म ( ज्येष्ठ + आषाढ़ – आदान काल का अन्त- हीन बल ) ऋतु में संचित दोष ( वात ) को अभ्रकाल ( वर्षा- श्रावण + भाद्रपद – विसर्ग काल का प्रारम्भ- हीन बल ) में संशोधन के द्वारा बाहर निकाल देना चाहिये ।

वर्षा ऋतु ( घनात्यये ) में संचित दोष ( पित्त ) को शरद् ( आश्विन + कार्तिक – विसर्ग काल का मध्य – मध्य बल ) ऋतु में शरीर से बाहर निकाल देने पर ऋतुकाल जन्य रोग नहीं होते हैं

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