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ROG NIDAN

• रोग विज्ञान एवं विकृति विज्ञान

आत्मा , मन , इन्द्रिय व शरीर के संयोग को जीवन कहा गया है । आत्मा विकार रहित होता है । अत : रोग का अधिष्ठान मन और शरीर को कहा गया है ।

दोष , धातु व मल इन तीनों को शरीर का मूल कहा गया है । आयुर्वेद में समस्त व्याधियों का कारण दोषों को स्वीकार किया गया है ।

वात , पित्त , कफ – यह तीन शारीरिक दोष व रज , तम – यह दो मानसिक दोष होते हैं । सभी व्याधियों के मूल रूप में दोषों का उल्लेख किया गया है ( सुश्रुत , सूत्र 24/8 ) । बिना दोष प्रकोपण किसी भी रोग की उत्पत्ति नहीं होती है ( सुश्रुत , सूत्र 35 / 19 ) ।

यह दोष प्रकोप की विशेषता , दृष्य की विशेषता के अनुसार असंख्य व्याधियाँ उत्पन्न करते हैं ( चरक , विमान 6 / 19 ) ।

आयुर्वेद में इन व्याधियों का विभिन्न प्रकार से वर्गीकरण किया गया है तथा इनका नामकरण किया गया है । परन्तु समस्त व्याधियों का नामत : ज्ञान रखना सम्भव नहीं है क्योंकि आचार्यों ने इन व्याधियों को अपरिसंख्येय कहा है ।

इस स्थिति में व्याधियों का ज्ञान दोष , स्थान , वर्ण एवं वेदना आदि के आधार पर प्राप्त किया जाता है । किसी भी चिकित्सा पद्धति में चिकित्सा पूर्व रोग – रोगी परीक्षा आवश्यक होती है । रोग परीक्षा हेतु निदान पञ्चक की सहायता ली जाती है ।

निदान पञ्चक के द्वारा व्याधि लक्षणादि के आधार पर हेतु , सम्प्राप्ति , उपशूल , पूर्वरूप आदि द्वारा व्याधि विनिश्चय किया जाता है । इससे व्याधि व दोष की स्थिति , बलाबल आदि का ज्ञान हो जाता है ।

 इसके साथ ही विभिन्न प्रकार से आतुर की परीक्षा कर उसके आयु , दोष , बल आदि का ज्ञान प्राप्त किया जाता है , तदुपरान्त युक्तिपूर्वक चिकित्सा व्यवस्था की जाती है ।

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