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RITUCHARYA

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ऋतुचर्या भाग -1

“मासैर्द्विसंख्यैर्माघाद्यैः क्रमात् षड्तवः स्मृताः ।

शिशिरोऽथ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाशरद्धिमाः ।।1।।

शिशिराद्यैस्त्रिभिस्तैस्तु विद्यादयनमुत्तरम् ।

आदानं च , तदादत्ते नृणां प्रतिदिनं बलम् ।। २ ।।”

 • षड्ऋतु-

माघ आदि दो – दो मास को मिलाने से क्रम से छ : ऋतुयें होती हैं- शिशिर , वसन्त , ग्रीष्म , वर्षा , शरद् और हिम ( हेमन्त ) ।

शिशिर आदि ( वसन्त , ग्रीष्म ) तीन ऋतुओं को उत्तरायण और इसे ही आदान काल भी कहते हैं । इस काल में प्रतिदिन सूर्य मनुष्यों के बल को लेता है ।

• आदान ( आग्नेय ) काल-

इस समय ( आदान काल में ) मार्ग के स्वभाव के कारण आदित्यं ( सूर्य ) और वायु अत्यन्त तीक्ष्ण , उष्ण और रूक्ष हो जाते हैं , इससे पृथ्वी का सौम्य गुण कम हो जाता है । सौम्य गुण के कम होने से क्रमशः तिक्त ( Bitter ) , कषाय ( Astringent ) और कटु ( Pungent ) रस शक्तिशाली हो जाते हैं । इसलिये आदान काल आग्नेय काल है ।

• विसर्ग काल-

वर्षादि ( वर्षा , शरद् , हेमन्त ) तीन ऋतुओं का नाम दक्षिणायन है , इसे विसर्ग काल कहते हैं क्योंकि इसमें बल का विसर्ग ( छोड़ना ) होता है ।

• “तप्तं तप्तांशुकिरणैः शीतं शीतांशुरश्मिभिः ।।५१ ।।

समन्तादप्यहोरात्रमगस्त्योदयनिर्विषम् ।

शुचि हंसोदकं नाम निर्मलं मलजिज्जलम् ।।५२ ।।

जाभिष्यन्दि न वा रूक्षं पानादिष्वमृतोपमम् ।”

-हंसोदक-

सम्पूर्ण रूप से तप्त सूर्य की किरणों ( तप्तांशुकिरणः ) से उष्ण और चन्द्रमा की शीतल किरणों ( शीतांशुरश्मिभिः ) से शीतल हुआ जल ( अप्य ) जो अगस्त्य के उदय होने से निर्विष हो गया हो वही पवित्र जल ‘ हसोदक ‘ है ।

यह जल शुद्ध और मलों को जीतने वाला होता है । यह जल न तो अभिष्यन्दि कारक होता है और न हि रूक्ष होता है तथा पीने आदि कार्यों में अमृत के समान ( पानादिषु + अमृतोपमम् ) होता है ।

•ऋतु सन्धि-

ऋतु ( वर्तमान ) का अन्तिम सप्ताह और आने वाले ऋतु का प्रथम सप्ताह – इन चौदह दिनों को ऋतु सन्धि कहते हैं । इनमें पूर्व ( पहले ) की ऋतु की विधि को धीरे – धीरे छोड़ते हैं और आने वाली ऋतु की विधि ( आहार – विहार ) को क्रमश : धीरे – धीरे ग्रहण करते हैं । सहसा विधि को छोड़ने से असात्म्यज रोग उत्पन्न होते हैं ।

• १. हेमन्त ऋतु- ( मार्गशीर्ष पौष – नवम्बर – दिसम्बर – दिसम्बर- जनवरी ) ।

काल- विसर्गकाल का अन्त सूर्य दक्षिणायन होने से सूर्य क्षीण बल वाला और चन्द्रमा का बल श्रेष्ठ होता है ।

आहार ( पथ्य ) – जठराग्नि के तीक्ष्ण होने के कारण गुरू माप ( उइद ) , बृहणकारक- विलेशय , औदक , आनूप , असह प्राणियों का मुना मांस , गुड़ , पीठी से बना पदार्थ , नूतन मद्य , ईख , दुग्ध से बने पदार्थ , वसा ( fat ) तैल , नया चावल आदि का सेवन करना चाहिये ।

विहार- व्यायाम , उद्धवर्तन , अभ्यंग , स्वेदन , धूमपान , अजन और आतप ( धूप ) का सेवन , उष्ण जल से स्नान , उष्ण गर्भगृह में रहना , अंगीठी , कुथ ( रूई की रजाई ) , कम्बल , कुंकुम ( केशर ) और मैथुन करना चाहिये ।

रस- मधुर – अम्ल – लवण रस का सेवन करना चाहिये ।

गुण- गुरू और स्निग्ध द्रव्यों का सेवन करना चाहिये ।

अपथ्य- वात वर्द्धक , लघु आहार , प्रवात ( तीव्र वायु ) और उदमन्थ ( जल में घुला सत्तू ) ।

२. शिशिर ऋतु ( माघ फाल्गुन – जनवरी – फरवरी – फरवरी – मार्च ) ।

काल- आदानकाल का प्रारम्भ , सूर्य के उत्तरायण होने से सूर्य तीव्र बल वाला चन्द्रमा का बल क्षीण होता है ।

आहार ( पथ्य ) – मेघ ( cloud ) , वायु और वर्षा के कारण ठंड ( cold ) अधिक होता है , किन्तु आदान काल होने से रुक्षता ( Dryness ) रहती है , अत : हेमन्त ऋतुचर्या का अधिक पालन करना चाहिये ।

विहार – हेमन्त ऋतुचर्या के अनुसार ।

रस- मधुर – अम्ल – लवण रस का सेवन करना चाहिये ।

गुण- गुरु , स्निग्ध और वात शामक द्रव्यों का सेवन ।

अपथ्य- हेमन्त ऋतुचर्या के अनुसार

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