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RITUCHARYA

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ऋतुचर्या भाग -2

३. वसन्त ऋतु ( चैत्र – वैशाख = मार्च – अप्रैल – अप्रैल – मई ) ।

काल- आदान काल का मध्य , सूर्य के उत्तरायण होने से इसका बल पूर्ण तीव्रतर होता है । चन्द्रमा का बल क्षीणतर होता है ।

आहार ( पथ्य ) – इस ऋतु में कफ का प्रकोप होता है अत : कफ शामक यव , गेहूँ ( गोधूम ) और जांगल पशु – पक्षी का मांस सेवन करना चाहिये । सुरा , पकाया ( Boild ) जल या नागरमोथा और शुण्ठी से पकाया ( Boiled ) या विजयसार से पकाया जल या मधु युक्त जल का पान करना चाहिये ।

विहार- शिशिर ऋतु में संचित कफ जब कुपित हो जाता है वह सूर्य की तीक्ष्णता के कारण पिघलता है , उसे तीक्ष्ण वमन से संशोधन द्वारा निकालकर , तीक्ष्ण धूमपान – गण्डूष – नस्य आदि कराते हैं , इसके बाद सज्जनों के साथ बैठना , रतिक्रिड़ा , सुगन्धित पुष्पों की माला , चन्दन और अगुरु का शरीर पर लेप करते हैं ।

रस- कटु – तिक्त – कषाय रस प्रधान द्रव्यों का सेवन- ये कफ शामक होते हैं ।

गुण- लघु गुण वाले द्रव्यों का सेवन करते हैं ।

अपथ्य- कफ वर्द्धक , गुरु , शीतल द्रव्य , दिवास्वाप ( कफ वर्द्धक होता है ) और मधुर – अम्ल – लवण रस के द्रव्यों का सेवन नहीं करना चाहिये ।

४. ग्रीष्म ऋतुचर्या– ( ज्येष्ठ आषाढ – मई – जून – जुलाई ) ।

काल – आदान काल का अन्त , सूर्य के उत्तरायण होने से इसका बल तीव्रतम होता है । चन्द्रमा का बल अत्यन्त क्षीण होता है ।

आहार ( पथ्य ) – इस काल में सूर्य सृष्टि के स्नेहांश का शोषण कर लेता है इसलिये शीतल और सुगन्धित शक्कर का शर्यत , मन्थ ( जल में पुला सत्तू ) , जांगल पशु – पक्षी – हिरण का मांस , शाली चावल , दुग्ध , घृत , द्राक्षा और नारियल का जल।

विहार- ताड़ के पंखे की हवा , कमल की माला , हल्के वस्त्र धारण करना , पानी के फव्वारे वाले शीतल गृह में शयन करना । रात्रि में आकाश के नीचे सुगन्धित पुष्पों को शय्या पर सोना और कभी – कभी मैथुन करना चाहिये ।

रस- मधुर रस का सेवन करते है क्योकि इस समय वात का संचय होता है ।

गुण- लघु गुण वाले द्रव्य का सेवन करते है अपथ्य- व्यायाम , धूप , कटु – अम्ल – लवण रस वाले और उष्ण द्रव्य तथा मद्य का त्याग करना चाहिये ।

५. वर्षा  ऋतु – ( श्रावण भाद्रपद – जुलाई – अगस्त – अगस्त – सितम्बर ) ।

काल – विसर्ग काल का प्रारम्भ , सूर्य दक्षिणायन , इसका बल क्षीण , चन्द्रमा का बल उत्तम ।

आहार ( पथ्य ) – शरीर दुर्बल , जठराग्नि मन्द और पान किये गये जल का अम्ल विपाक होता है , अतः पुराना शालि चावल , गेहूं और जौ को कृत यूष के साथ सेवन करना चाहिये । दोष रहित मधु , मदिरा , दिव्य जल पकाकर क्लेद नाशक वात नाशक , लघु और स्निग्ध आहार लेना चाहिये ।

विहार- वमन – विरेचन से शरीर का शोधन , बस्तिकर्म , सर्प – बिच्छू – मच्छर और चूहों से रहित गृह में निवास करना , प्रचर्पण ( यस से शरीर का घर्षण ) , उद्धर्वतन ( उबटन ) , स्नान , धूमपान और सुगन्धित अगुरु का लेप करते है ।

रस- अम्ल – लवण रस बात के शमनार्थ लेते है ।

गुण – स्निग्ध गुण वात शमनार्थ देते हैं।

अपथ्य- नदियों का जल , मन्थ , दिवास्थाप , अतिद्रव , अतिमैथुन , ओस , व्यायाम , अत्यन्त पैदन चलना और धूप का सेवन त्याज्य है ।

६. शरद् ऋतु ( आचिन कार्तिक – सितम्बर – अक्टूबर – अक्टूबर – नवम्बर ) ।

काल – विसर्ग काल का मध्य , सूर्य के दक्षिणायन होने से इसका बल क्षीणतर और चन्द्रमा का बल उत्तम होता है ।

आहार ( पथ्य ) – इस समय पित्त का प्रकोप होता है इसलिये तिक्त द्रव्यों से सिद्ध घृत , शालि चावल , षष्टिक ( साठी ) चावल , गेहूँ , जौ , मूंग , शर्करा , परवल , आमलकी , द्राक्षा , जांगल प्राणियों का मांस और पीने के लिये हंसोदक का सेवन करना चाहिये । बैठकर चन्द्रकिरणों का सेवन करना चाहिये ।

विहार- विरेचन , रक्तमोक्षण , हल्का वस्त्र , पुष्पों की माला , खस का शीतल लेप लगाकर सन्ध्या काल में छत पर  बैठकर चंद्रमा की किरणों का सेवन करना चाहिए।

रस- मधुर – तिक्त – कषाय रस का सेवन करते हैं यह पित्तशामक है ।

गुण- शीतल और लघु गुण वाले द्रव्यों का सेवन । ( तुषार ) का सेवन वर्जित है ।

अपथ्य- भर पेट भोजन , दही , धूप , क्षार , वसा , तैल , पूर्वीवायु , तीक्ष्ण मद्य , दिवास्वाप ( दिन में सोना ) और ओस का सेवन वर्जित है।

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